तेरी रज़ा

तेरी रज़ा

“तेरी रज़ा”

तेरे नाम से ही तो मेरी हर साँस जगी,
तेरे इश्क़ में डूबकर ही मेरी रूह सजी।

मैं ढूँढता रहा तुझको हर इक दर–ओ–निशाँ में,
जब दिल के भीतर देखा, तू वहीं तो बसी।

तेरे नूर से रौशन हर अँधेरा बन गया,
तेरी एक नज़र से ही मेरी रात हँसी।

ना मांगूँ जहाँ, ना शोहरत, ना जन्नत की चाह,
बस तेरे क़दमों में हो मेरी ये ज़िन्दगी।

मैं कुछ भी नहीं, तू ही सब कुछ है यहाँ,
तेरी रज़ा में ही तो मेरी बंदगी।

अब न कह “मैं”, न कह “तू” जुदा,
इश्क़ में मिटकर ही मिली है ये आज़ादी।

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