स्वप्न और जागरण II

स्वप्न और जागरण II

स्वप्न और जागरण के बीच जो पल ठहर जाता है, वहीं असली मैं का पहला परिचय मिलता है; आँखें खुली हों या मूँदी, बात बस इतनी-सी है— जो भीतर जाग रहा हो, जीवन असल में वही होता है।

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