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कोयल

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काली-काली कू-कू करती, जो है डाली-डाली फिरती! कुछ अपनी हीं धुन में ऐंठी  छिपी हरे पत्तों में बैठी जो पंचम सुर में गाती है वह हीं कोयल कहलाती है. जब जाड़ा कम हो जाता है  सूरज थोड़ा गरमाता है  तब होता है समा निराला  जी को बहुत लुभाने वाला हरे पेड़ सब हो जाते हैं  नये नये पत्ते पाते हैं कितने हीं फल औ फलियों से नई नई कोपल कलियों से भली भांति वे लद जाते हैं बड़े मनोहर दिखलाते हैं रंग रंग के प्यारे प्यारे  फूल फूल जाते हैं सारे बसी हवा बहने लगती है  दिशा सब महकने लगती है तब यह मतवाली होकर  कूक कूक डाली डाली पर अजब समा दिखला देती है सबका मन अपना लेती है लडके जब अपना मुँह खोलो तुम भी मीठी बोली बोलो इससे कितने सुख पाओगे सबके प्यारे बन जाओगे. -अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

कर्मवीर | karmveer

Karmveer कर्मवीर
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।

आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।

जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज कल करते हुये जो दिन गंवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिये
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये ।

व्योम को छूते हुये दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुयी ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।

---अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

एक तिनका

एक तिनका



मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,

एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।

आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,

एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।


मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,

लाल होकर आँख भी दुखने लगी।

मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,

ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।


जब किसी ढब से निकल तिनका गया,

तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।

ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,

एक तिनका है बहुत तेरे लिए।







अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

बूँद

बूँद


ज्योंनिकलकरबादलोंकीगोदसे
थीअभीएकबूँदकुछआगेबढ़ी
सोचनेफिर-फिरयहीजीमेंलगी,
आह ! क्योंघरछोड़करमैंयोंकढ़ी ?

देवमेरेभाग्यमेंक्याहैबदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोगयोंहीहैंझिझकते, सोचते
जबकिउनकोछोड़नापड़ताहैघर
किन्तुघरकाछोड़नाअक्सरउन्हें
बूँदलौंकुछऔरहीदेताहैकर ।

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