माखनलाल चतुर्वेदी


खून हो जाये न तेरा देख, पानी, मर का त्यौहार, जीवन की जवानी।

माखनलाल चतुर्वेदी (४ अप्रैल १८८९-३० जनवरी १९६८) भारत के ख्यातिप्राप्त कवि, लेखक और पत्रकार थे जिनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुईं। श्री माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई नामक स्थान पर हुआ था।इनके पिता का नाम नन्दलाल चतुर्वेदी था जो गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। प्राइमरी शिक्षा के बाद घर पर ही इन्होंने संस्कृत ,बंगला ,अंग्रेजी ,गुजरती आदि भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया।

सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे हिंदी रचनाकार थे। प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रतिष्ठत पत्रों के संपादक के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया और नई पीढ़ी का आह्वान किया कि वह गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर बाहर आए। इसके लिये उन्हें अनेक बार ब्रिटिश साम्राज्य का कोपभाजन बनना पड़ा। वे सच्चे देशप्रमी थे और १९२१-२२ के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए। आपकी कविताओं में देशप्रेम के साथ-साथ प्रकृति और प्रेम का भी चित्रण हुआ है।


प्रकाशित कृतियाँ
हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूंजे धरा, बीजुरी काजल आँज रही आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं।
कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पांव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि इनके प्रसिद्ध गद्यात्मक कृतियाँ हैं।

पुरस्कार व सम्मान
१९४३ में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा 'देव पुरस्कार' माखनलालजी को 'हिम किरीटिनी' पर दिया गया था। १९५४ में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की स्थापना होने पर हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दादा को 'हिमतरंगिनी' के लिए प्रदान किया गया। 'पुष्प की अभिलाषा' और 'अमर राष्ट्र' जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने १९५९ में डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। १९६३ में भारत सरकार ने 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया। १० सितंबर १९६७ को राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में माखनलालजी ने यह अलंकरण लौटा दिया। १६-१७ जनवरी १९६५ को मध्यप्रदेश शासन की ओर से खंडवा में 'एक भारतीय आत्मा' माखनलाल चतुर्वेदी के नागरिक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। तत्कालीन राज्यपाल श्री हरि विनायक पाटसकर और मुख्यमंत्री पं॰ द्वारकाप्रसाद मिश्र तथा हिन्दी के अग्रगण्य साहित्यकार-पत्रकार इस गरिमामय समारोह में उपस्थित थे। भोपाल का माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है। उनके काव्य संग्रह 'हिमतरंगिणी' के लिये उन्हें १९५५ में हिन्दी के 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया

कृष्णा सोबती

2017 का ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता समेत कई राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती का जन्म गुजरात में 18 फरवरी 1925 को हुआ था | विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बस गयीं | आप का देहावसान २५ जनुअरी २०१९ को एक लम्बी बिमारी के बाद सुबह साढ़े आठ बजे एक निजी अस्पपताल में हो गया |

प्रकाशित कृतियाँ
कहानी संग्रह- बादलों के घेरे - 1980
लम्बी कहानी (आख्यायिका/उपन्यासिका)- डार से बिछुड़ी -1958, मित्रो मरजानी -1967, यारों के यार -1968
तिन पहाड़ -1968, ऐ लड़की -1991,जैनी मेहरबान सिंह -2007,
उपन्यास- सूरजमुखी अँधेरे के -1972, ज़िन्दगी़नामा -1979, दिलोदानिश -1993, समय सरगम -2000
गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान -2017 (निजी जीवन को स्पर्श करती औपन्यासिक रचना)
विचार-संवाद-संस्मरण- हम हशमत (तीन भागों में), सोबती एक सोहबत, शब्दों के आलोक में, सोबती वैद संवाद, मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में -2017, लेखक का जनतंत्र -2018, मार्फ़त दिल्ली -2018
यात्रा-आख्यान- बुद्ध का कमण्डल : लद्दाख़

कहानी (प्रेमचंद)

माँ -

कहानी (प्रेमचंद)
आज बन्दी छूटकर घर आ रहा है। करुणा ने एक दिन पहले ही घर लीप-पोत रखा था। इन तीन वर्षो में उसने कठिन तपस्या करके जो दस-पॉँच रूपये जमा कर रखे थे, वह सब पति के सत्कार और स्वागत की तैयारियों में खर्च कर दिए। पति के लिए धोतियों का नया जोड़ा लाई थी, नए कुरते बनवाए थे, बच्चे के लिए नए कोट और टोपी की आयोजना की थी। बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर प्रसन्न होती। अगर इस बच्चे ने सूर्य की भॉँति उदय होकर उसके अंधेरे जीवन को प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अन्त कर दिया होता। पति के कारावास-दण्ड के तीन ही महीने बाद इस बालक का जन्म हुआ। उसी का मुँह देख-देखकर करूणा ने यह तीन साल काट दिए थे। वह सोचती—जब मैं बालक को उनके सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जाऍंगे, फिर गोद में उठा लेंगे और कहेंगे—करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया। कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जाऍंगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक दृष्टि दृदय की सारी व्यवस्थाओं को धो डालेगी। इस कल्पना का आन्नद लेकर वह फूली न समाती थी।
वह सोच रही थी—आदित्य के साथ बहुत—से आदमी होंगे। जिस समय वह द्वार पर पहुँचेगे, जय—जयकार’ की ध्वनि से आकाश गूँज उठेगा। वह कितना स्वर्गीय दृश्य होगा! उन आदमियों के बैठने के लिए करूणा ने एक फटा-सा टाट बिछा दिया था, कुछ पान बना दिए थे ओर बार-बार आशामय नेत्रों से द्वार की ओर ताकती थी। पति की वह सुदृढ़ उदार तेजपूर्ण मुद्रा बार-बार ऑंखों में फिर जाती थी। उनकी वे बातें बार-बार याद आती थीं, जो चलते समय उनके मुख से निकलती थी, उनका वह धैर्य, वह आत्मबल, जो पुलिस के प्रहारों के सामने भी अटल रहा था, वह मुस्कराहट जो उस समय भी उनके अधरों पर खेल रही थी; वह आत्मभिमान, जो उस समय भी उनके मुख से टपक रहा था, क्या करूणा के हृदय से कभी विस्मृत हो सकता था! उसका स्मरण आते ही करुणा के निस्तेज मुख पर आत्मगौरव की लालिमा छा गई। यही वह अवलम्ब था, जिसने इन तीन वर्षो की घोर यातनाओं में भी उसके हृदय को आश्वासन दिया था। कितनी ही राते फाकों से गुजरीं, बहुधा घर में दीपक जलने की नौबत भी न आती थी, पर दीनता के आँसू कभी उसकी ऑंखों से न गिरे। आज उन सारी विपत्तियों का अन्त हो जाएगा। पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी। वह अनंत निधि पाकर फिर उसे कोई अभिलाषा न रहेगी।
गगन-पथ का चिरगामी लपका हुआ विश्राम की ओर चला जाता था, जहॉँ संध्या ने सुनहरा फर्श सजाया था और उज्जवल पुष्पों की सेज बिछा रखी थी। उसी समय करूणा को एक आदमी लाठी टेकता आता दिखाई दिया, मानो किसी जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि हो। पग-पग पर रूककर खॉँसने लगता थी। उसका सिर झुका हुआ था, करणा उसका चेहरा न देख सकती थी, लेकिन चाल-ढाल से कोई बूढ़ा आदमी मालूम होता था; पर एक क्षण में जब वह समीप आ गया, तो करूणा पहचान गई। वह उसका प्यारा पति ही था, किन्तु शोक! उसकी सूरत कितनी बदल गई थी। वह जवानी, वह तेज, वह चपलता, वह सुगठन, सब प्रस्थान कर चुका था। केवल हड्डियों का एक ढॉँचा रह गया था। न कोई संगी, न साथी, न यार, न दोस्त। करूणा उसे पहचानते ही बाहर निकल आयी, पर आलिंगन की कामना हृदय में दबाकर रह गई। सारे मनसूबे धूल में मिल गए। सारा मनोल्लास ऑंसुओं के प्रवाह में बह गया, विलीन हो गया।
आदित्य ने घर में कदम रखते ही मुस्कराकर करूणा को देखा। पर उस मुस्कान में वेदना का एक संसार भरा हुआ थां करूणा ऐसी शिथिल हो गई, मानो हृदय का स्पंदन रूक गया हो। वह फटी हुई आँखों से स्वामी की ओर टकटकी बॉँधे खड़ी थी, मानो उसे अपनी ऑखों पर अब भी विश्वास न आता हो। स्वागत या दु:ख का एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला। बालक भी गोद में बैठा हुआ सहमी ऑखें से इस कंकाल को देख रहा था और माता की गोद में चिपटा जाता था।
आखिर उसने कातर स्वर में कहा—यह तुम्हारी क्या दशा है? बिल्कुल पहचाने नहीं जाते!
आदित्य ने उसकी चिन्ता को शांत करने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके कहा—कुछ नहीं, जरा दुबला हो गया हूँ। तुम्हारे हाथों का भोजन पाकर फिर स्वस्थ हो जाऊँगा।
करूणा—छी! सूखकर काँटा हो गए। क्या वहॉँ भरपेट भोजन नहीं मिलात? तुम कहते थे, राजनैतिक आदमियों के साथ बड़ा अच्छा व्यवहार किया जाता है और वह तुम्हारे साथी क्या हो गए जो तुम्हें आठों पहर घेरे रहते थे और तुम्हारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार रहते थे?
आदित्य की त्योरियों पर बल पड़ गए। बोले—यह बड़ा ही कटु अनुभव है करूणा! मुझे न मालूम था कि मेरे कैद होते ही लोग मेरी ओर से यों ऑंखें फेर लेंगे, कोई बात भी न पूछेगा। राष्ट्र के नाम पर मिटनेवालों का यही पुरस्कार है, यह मुझे न मालूम था। जनता अपने सेवकों को बहुत जल्द भूल जाती है, यह तो में जानता था, लेकिन अपने सहयोगी ओर सहायक इतने बेवफा होते हैं, इसका मुझे यह पहला ही अनुभव हुआ। लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं। सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं। मेरी भूल थी कि मैं इसके लिए यश और नाम चाहता था।
करूणा—तो क्या वहाँ भोजन भी न मिलता था?
आदित्य—यह न पूछो करूणा, बड़ी करूण कथा है। बस, यही गनीमत समझो कि जीता लौट आया। तुम्हारे दर्शन बदे थे, नहीं कष्ट तो ऐसे-ऐसे उठाए कि अब तक मुझे प्रस्थान कर जाना चाहिए था। मैं जरा लेटँगा। खड़ा नहीं रहा जाता। दिन-भर में इतनी दूर आया हूँ।
करूणा—चलकर कुछ खा लो, तो आराम से लेटो। (बालक को गोद में उठाकर) बाबूजी हैं बेटा, तुम्हारे बाबूजी। इनकी गोद में जाओ, तुम्हे प्यार करेंगे।
आदित्य ने ऑंसू-भरी ऑंखों से बालक को देखा और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने लगा। अपनी जीर्ण दशा पर उन्हें कभी इतना दु:ख न हुआ था। ईश्वर की असीम दया से यदि उनकी दशा संभल जाती, तो वह फिर कभी राष्ट्रीय आन्दोलन के समीप न जाते। इस फूल-से बच्चे को यों संसार में लाकर दरिद्रता की आग में झोंकने का उन्हें क्या अधिकरा था? वह अब लक्ष्मी की उपासना करेंगे और अपना क्षुद्र जीवन बच्चे के लालन-पालन के लिए अपिर्त कर देंगे। उन्हें इस समय ऐसा ज्ञात हुआ कि बालक उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है, मानो कह रहा है—‘मेरे साथ आपने कौन-सा कर्त्तव्य-पालन किया?’ उनकी सारी कामना, सारा प्यार बालक को हृदय से लगा देने के लिए अधीर हो उठा, पर हाथ फैल न सके। हाथों में शक्ति ही न थी।
करूणा बालक को लिये हुए उठी और थाली में कुछ भोजन निकलकर लाई। आदित्य ने क्षुधापूर्ण, नेत्रों से थाली की ओर देखा, मानो आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने की चीज सामने आई हैं। जानता था कि कई दिनों के उपवास के बाद और आरोग्य की इस गई-गुजरी दशा में उसे जबान को काबू में रखना चाहिए पर सब्र न कर सका, थाली पर टूट पड़ा और देखते-देखते थाली साफ कर दी। करूणा सशंक हो गई। उसने दोबारा किसी चीज के लिए न पूछा। थाली उठाकर चली गई, पर उसका दिल कह रहा था-इतना तो कभी न खाते थे।
करूणा बच्चे को कुछ खिला रही थी, कि एकाएक कानों में आवाज आई—करूणा!
करूणा ने आकर पूछा—क्या तुमने मुझे पुकारा है?
आदित्य का चेहरा पीला पड़ गया था और सॉंस जोर-जोर से चल रही थी। हाथों के सहारे वही टाट पर लेट गए थे। करूणा उनकी यह हालत देखकर घबर गई। बोली—जाकर किसी वैद्य को बुला लाऊँ?
आदित्य ने हाथ के इशारे से उसे मना करके कहा—व्यर्थ है करूणा! अब तुमसे छिपाना व्यर्थ है, मुझे तपेदिक हो गया हे। कई बार मरते-मरते बच गया हूँ। तुम लोगों के दर्शन बदे थे, इसलिए प्राण न निकलते थे। देखों प्रिये, रोओ मत।
करूणा ने सिसकियों को दबाते हुए कहा—मैं वैद्य को लेकर अभी आती हूँ।
आदित्य ने फिर सिर हिलाया—नहीं करूणा, केवल मेरे पास बैठी रहो। अब किसी से कोई आशा नहीं है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहॉँ पहुँच कैसे गया। न जाने कौन दैवी शक्ति मुझे वहॉँ से खींच लाई। कदाचित् यह इस बुझते हुए दीपक की अन्तिम झलक थी। आह! मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। इसका मुझे हमेशा दु:ख रहेगा! मैं तुम्हें कोई आराम न दे सका। तुम्हारे लिए कुछ न कर सका। केवल सोहाग का दाग लगाकर और एक बालक के पालन का भार छोड़कर चला जा रहा हूं। आह!
करूणा ने हृदय को दृढ़ करके कहा—तुम्हें कहीं दर्द तो नहीं है? आग बना लाऊँ? कुछ बताते क्यों नहीं?
आदित्य ने करवट बदलकर कहा—कुछ करने की जरूरत नहीं प्रिये! कहीं दर्द नहीं। बस, ऐसा मालूम हो रहा हे कि दिल बैठा जाता है, जैसे पानी में डूबा जाता हूँ। जीवन की लीला समाप्त हो रही हे। दीपक को बुझते हुए देख रहा हूँ। कह नहीं सकता, कब आवाज बन्द हो जाए। जो कुछ कहना है, वह कह डालना चाहता हूँ, क्यों वह लालसा ले जाऊँ। मेरे एक प्रश्न का जवाब दोगी, पूछूँ?
करूणा के मन की सारी दुर्बलता, सारा शोक, सारी वेदना मानो लुप्त हो गई और उनकी जगह उस आत्मबल काउदय हुआ, जो मृत्यु पर हँसता है और विपत्ति के साँपों से खेलता है। रत्नजटित मखमली म्यान में जैसे तेज तलवार छिपी रहती है, जल के कोमल प्रवाह में जैसे असीम शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही रमणी का कोमल हृदय साहस और धैर्य को अपनी गोद में छिपाए रहता है। क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच लेता है, विज्ञान जैसे जल-शक्ति का उदघाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है।
करूणा ने पति के सिर पर हाथ रखते हुए कहा—पूछते क्यों नहीं प्यारे!
आदित्य ने करूणा के हाथों के कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए कहा—तुम्हारे विचार में मेरा जीवन कैसा था? बधाई के योग्य? देखो, तुमने मुझसे कभी पर्दा नहीं रखा। इस समय भी स्पष्ट कहना। तुम्हारे विचार में मुझे अपने जीवन पर हँसना चाहिए या रोना चाहिऍं?
करूणा ने उल्लास के साथ कहा—यह प्रश्न क्यों करते हो प्रियतम? क्या मैंने तुम्हारी उपेक्षा कभी की हैं? तुम्हारा जीवन देवताओं का—सा जीवन था, नि:स्वार्थ, निर्लिप्त और आदर्श! विघ्न-बाधाओं से तंग आकर मैंने तुम्हें कितनी ही बार संसार की ओर खींचने की चेष्टा की है; पर उस समय भी मैं मन में जानती थी कि मैं तुम्हें ऊँचे आसन से गिरा रही हूं। अगर तुम माया-मोह में फँसे होते, तो कदाचित् मेरे मन को अधिक संतोष होता; लेकिन मेरी आत्मा को वह गर्व और उल्लास न होता, जो इस समय हो रहा है। मैं अगर किसी को बड़े-से-बड़ा आर्शीवाद दे सकती हूँ, तो वह यही होगा कि उसका जीवन तुम्हारे जैसा हो।
यह कहते-कहते करूणा का आभाहीन मुखमंडल जयोतिर्मय हो गया, मानो उसकी आत्मा दिव्य हो गई हो। आदित्य ने सगर्व नेत्रों से करूणा को देखकर कहा बस, अब मुझे संतोष हो गया, करूणा, इस बच्चे की ओर से मुझे कोई शंका नहीं है, मैं उसे इससे अधिक कुशल हाथों में नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि जीवन-भर यह ऊँचा और पवित्र आदर्श सदैव तुम्हारे सामने रहेगा। अब मैं मरने को तैयार हूँ।

~~2~~

सात वर्ष बीत गए।
बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी। भय तो उसे छू भी नहीं गया था। करूणा का संतप्त हृदय उसे देखकर शीतल हो जाता। संसार करूणा को अभागिनी और दीन समझे। वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती। उसने उन आभूषणों को बेच डाला, जो पति के जीवन में उसे प्राणों से प्रिय थे, और उस धन से कुछ गायें और भैंसे मोल ले लीं। वह कृषक की बेटी थी, और गो-पालन उसके लिए कोई नया व्यवसाय न था। इसी को उसने अपनी जीविका का साधन बनाया। विशुद्ध दूध कहॉँ मयस्सर होता है? सब दूध हाथों-हाथ बिक जाता। करूणा को पहर रात से पहर रात तक काम में लगा रहना पड़ता, पर वह प्रसन्न थी। उसके मुख पर निराशा या दीनता की छाया नहीं, संकल्प और साहस का तेज है। उसके एक-एक अंग से आत्मगौरव की ज्योति-सी निकल रही है; ऑंखों में एक दिव्य प्रकाश है, गंभीर, अथाह और असीम। सारी वेदनाऍं—वैधव्य का शोक और विधि का निर्मम प्रहार—सब उस प्रकाश की गहराई में विलीन हो गया है।
प्रकाश पर वह जान देती है। उसका आनंद, उसकी अभिलाषा, उसका संसार उसका स्वर्ग सब प्रकाश पर न्यौछावर है; पर यह मजाल नहीं कि प्रकाश कोई शरारत करे और करूणा ऑखें बंद कर ले। नहीं, वह उसके चरित्र की बड़ी कठोरता से देख-भाल करती है। वह प्रकाश की मॉँ नहीं, मॉँ-बाप दोनों हैं। उसके पुत्र-स्नेह में माता की ममता के साथ पिता की कठोरता भी मिली हुई है। पति के अन्तिम शब्द अभी तक उसके कानों में गूँज रहे हैं। वह आत्मोल्लास, जो उनके चेहरे पर झलकने लगा था, वह गर्वमय लाली, जो उनकी ऑंखो में छा गई थी, अभी तक उसकी ऑखों में फिर रही है। निरंतर पति-चिन्तन ने आदित्य को उसकी ऑंखों में प्रत्यक्ष कर दिया है। वह सदैव उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करती है। उसे ऐसा जान पड़ता है कि आदित्य की आत्मा सदैव उसकी रक्षा करती रहती है। उसकी यही हार्दिक अभिलाषा है कि प्रकाश जवान होकर पिता का पथगामी हो।
संध्या हो गई थी। एक भिखारिन द्वार पर आकर भीख मॉँगने लगी। करूणा उस समय गउओं को पानी दे रही थी। प्रकाश बाहर खेल रहा था। बालक ही तो ठहरा! शरारत सूझी। घर में गया और कटोरे में थोड़ा-सा भूसा लेकर बाहर निकला। भिखारिन ने अबकी झेली फैला दी। प्रकाश ने भूसा उसकी झोली में डाल दिया और जोर-जोर से तालियॉँ बजाता हुआ भागा।
भिखारिन ने अग्निमय नेत्रों से देखकर कहा—वाह रे लाड़ले! मुझसे हँसी करने चला है! यही मॉँ-बाप ने सिखाया है! तब तो खूब कुल का नाम जगाओगे!
करूणा उसकी बोली सुनकर बाहर निकल आयी और पूछा—क्या है माता? किसे कह रही हो?
भिखारिन ने प्रकाश की तरफ इशारा करके कहा—वह तुम्हारा लड़का है न। देखो, कटोरे में भूसा भरकर मेरी झोली में डाल गया है। चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में मिल गया। कोई इस तरह दुखियों को सताता है? सबके दिन एक-से नहीं रहते! आदमी को घंमड न करना चाहिए।
करूणा ने कठोर स्वर में पुकारा—प्रकाश?
प्रकाश लज्जित न हुआ। अभिमान से सिर उठाए हुए आया और बोला—वह हमारे घर भीख क्यों मॉँगने आयी है? कुछ काम क्यों नहीं करती?
करुणा ने उसे समझाने की चेष्टा करके कहा—शर्म नहीं आती, उल्टे और ऑंख दिखाते हो।
प्रकाश—शर्म क्यों आए? यह क्यों रोज भीख मॉँगने आती है? हमारे यहॉँ क्या कोई चीज मुफ्त आती है?
करूणा—तुम्हें कुछ न देना था तो सीधे से कह देते; जाओ। तुमने यह शरारत क्यों की?
प्रकाश—उनकी आदत कैसे छूटती?
करूणा ने बिगड़कर कहा—तुम अब पिटोंगे मेरे हाथों।
प्रकाश—पिटूँगा क्यों? आप जबरदस्ती पीटेंगी? दूसरे मुल्कों में अगर कोई भीख मॉँगे, तो कैद कर लिया जाए। यह नहीं कि उल्टे भिखमंगो को और शह दी जाए।
करूणा—जो अपंग है, वह कैसे काम करे?
प्रकाश—तो जाकर डूब मरे, जिन्दा क्यों रहती है?
करूणा निरूत्तर हो गई। बुढ़िया को तो उसने आटा-दाल देकर विदा किया, किन्तु प्रकाश का कुतर्क उसके हृदय में फोड़े के समान टीसता रहा। उसने यह धृष्टता, यह अविनय कहॉँ सीखी? रात को भी उसे बार-बार यही ख्याल सताता रहा।
आधी रात के समीप एकाएक प्रकाश की नींद टूटी। लालटेन जल रही है और करुणा बैठी रो रही है। उठ बैठा और बोला—अम्मॉँ, अभी तुम सोई नहीं?
करूणा ने मुँह फेरकर कहा—नींद नहीं आई। तुम कैसे जग गए? प्यास तो नही लगी है?
प्रकाश—नही अम्मॉँ, न जाने क्यों ऑंख खुल गई—मुझसे आज बड़ा अपराध हुआ, अम्मॉँ !
करूणा ने उसके मुख की ओर स्नेह के नेत्रों से देखा।
प्रकाश—मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की। मुझे क्षमा करो, फिर कभी ऐसी शरारत न करूँगा।
यह कहकर रोने लगा। करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का चुम्बन करके बोली—बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है?
प्रकाश ने सिसकते हुए कहा—नहीं, अम्मॉँ, मुझे दिल से अफसोस हो रहा है। अबकी वह बुढ़िया आएगी, तो में उसे बहुत-से पैसे दूँगा।
करूणा का हृदय मतवाला हो गया। ऐसा जान पड़ा, आदित्य सामने खड़े बच्चे को आर्शीवाद दे रहे हैं और कह रहे हैं, करूणा, क्षोभ मत कर, प्रकाश अपने पिता का नाम रोशन करेगा। तेरी संपूर्ण कामनाँ पूरी हो जाएँगी।
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लेकिन प्रकाश के कर्म और वचन में मेल न था और दिनों के साथ उसके चरित्र का अंग प्रत्यक्ष होता जाता था। जहीन था ही, विश्वविद्यालय से उसे वजीफे मिलते थे, करूणा भी उसकी यथेष्ट सहायता करती थी, फिर भी उसका खर्च पूरा न पड़ता था। वह मितव्ययता और सरल जीवन पर विद्वत्ता से भरे हुए व्याख्यान दे सकता था, पर उसका रहन-सहन फैशन के अंधभक्तों से जौ-भर घटकर न था। प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी। उसके मन और बुद्धि में निरंतर द्वन्द्व होता रहता था। मन जाति की ओर था, बुद्धि अपनी ओर। बुद्धि मन को दबाए रहती थी। उसके सामने मन की एक न चलती थी। जाति-सेवा ऊसर की खेती है, वहॉँ बड़े-से-बड़ा उपहार जो मिल सकता है, वह है गौरव और यश; पर वह भी स्थायी नहीं, इतना अस्थिर कि क्षण में जीवन-भर की कमाई पर पानी फिर सकता है। अतएव उसका अन्त:करण अनिवार्य वेग के साथ विलासमय जीवन की ओर झुकता था। यहां तक कि धीरे-धीरे उसे त्याग और निग्रह से घृणा होने लगी। वह दुरवस्था और दरिद्रता को हेय समझता था। उसके हृदय न था, भाव न थे, केवल मस्तिष्क था। मस्तिष्क में दर्द कहॉँ? वहॉँ तो तर्क हैं, मनसूबे हैं।
सिन्ध में बाढ़ आई। हजारों आदमी तबाह हो गए। विद्यालय ने वहॉँ एक सेवा समिति भेजी। प्रकाश के मन में द्वंद्व होने लगा—जाऊँ या न जाऊँ? इतने दिनों अगर वह परीक्षा की तैयारी करे, तो प्रथम श्रेणी में पास हो। चलते समय उसने बीमारी का बहाना कर दिया। करूणा ने लिखा, तुम सिन्ध न गये, इसका मुझे दुख है। तुम बीमार रहते हुए भी वहां जा सकते थे। समिति में चिकित्सक भी तो थे! प्रकाश ने पत्र का उत्तर न दिया।
उड़ीसा में अकाल पड़ा। प्रजा मक्खियों की तरह मरने लगी। कांग्रेस ने पीड़ितो के लिए एक मिशन तैयार किया। उन्हीं दिनों विद्यालयों ने इतिहास के छात्रों को ऐतिहासिक खोज के लिए लंका भेजने का निश्चय किया। करूणा ने प्रकाश को लिखा—तुम उड़ीसा जाओ। किन्तु प्रकाश लंका जाने को लालायित था। वह कई दिन इसी दुविधा में रहा। अंत को सीलोन ने उड़ीसा पर विजय पाई। करुणा ने अबकी उसे कुछ न लिखा। चुपचाप रोती रही।
सीलोन से लौटकर प्रकाश छुट्टियों में घर गया। करुणा उससे खिंची-खिंची रहीं। प्रकाश मन में लज्जित हुआ और संकल्प किया कि अबकी कोई अवसर आया, तो अम्मॉँ को अवश्य प्रसन्न करूँगा। यह निश्चय करके वह विद्यालय लौटा। लेकिन यहां आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो गई। यहॉँ तक कि परीक्षा के दिन आ गए; मगर इम्तहान से फुरसत पाकर भी प्रकाश घर न गया। विद्यालय के एक अध्यापक काश्मीर सैर करने जा रहे थे। प्रकाश उन्हीं के साथ काश्मीर चल खड़ा हुआ। जब परीक्षा-फल निकला और प्रकाश प्रथम आया, तब उसे घर की याद आई! उसने तुरन्त करूणा को पत्र लिखा और अपने आने की सूचना दी। माता को प्रसन्न करने के लिए उसने दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे—अब मै आपकी आज्ञा का पालन करने को तैयार हूँ। मैंने शिक्षा-सम्बन्धी कार्य करने का निश्चक किया हैं इसी विचार से मेंने वह विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। हमारे नेता भी तो विद्यालयों के आचार्यो ही का सम्मान करते हें। अभी वक इन उपाधियों के मोह से वे मुक्त नहीं हुए हे। हमारे नेता भी योग्यता, सदुत्साह, लगन का उतना सम्मान नहीं करते, जितना उपाधियों का! अब मेरी इज्जत करेंगे और जिम्मेदारी को काम सौपेंगें, जो पहले मॉँगे भी न मिलता।
करूणा की आस फिर बँधी।

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विद्यालय खुलते ही प्रकाश के नाम रजिस्ट्रार का पत्र पहुँचा। उन्होंने प्रकाश का इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी। प्रकाश पत्र हाथ में लिये हर्ष के उन्माद में जाकर मॉँ से बोला—अम्मॉँ, मुझे इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा मिल गया।
करूणा ने उदासीन भाव से पूछा—तो तुम्हारा क्या इरादा है?
प्रकाश—मेरा इरादा? ऐसा अवसर पाकर भला कौन छोड़ता है!
करूणा—तुम तो स्वयंसेवकों में भरती होने जा रहे थे?
प्रकाश—तो आप समझती हैं, स्वयंसेवक बन जाना ही जाति-सेवा है? मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य कर सकता हूँ और अम्मॉँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना उपकार कर सकता है, उतना एक हजार स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते। मैं तो सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठूँगा और मुझे विश्वास है कि सफल हो जाऊँगा।
करूणा ने चकित होकर पूछा-तो क्या तुम मजिस्ट्रेट हो जाओगे?
प्रकाश—सेवा-भाव रखनेवाला एक मजिस्ट्रेट कांग्रेस के एक हजार सभापतियों से ज्यादा उपकार कर सकता है। अखबारों में उसकी लम्बी-लम्बी तारीफें न छपेंगी, उसकी वक्तृताओं पर तालियॉँ न बजेंगी, जनता उसके जुलूस की गाड़ी न खींचेगी और न विद्यालयों के छात्र उसको अभिनंदन-पत्र देंगे; पर सच्ची सेवा मजिस्ट्रेट ही कर सकता है।
करूणा ने आपत्ति के भाव से कहा—लेकिन यही मजिस्ट्रेट तो जाति के सेवकों को सजाऍं देते हें, उन पर गोलियॉँ चलाते हैं?
प्रकाश—अगर मजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का भाव है, तो वह नरमी से वही काम करता है, जो दूसरे गोलियॉँ चलाकर भी नहीं कर सकते।
करूणा—मैं यह नहीं मानूँगी। सरकार अपने नौकरों को इतनी स्वाधीनता नहीं देती। वह एक नीति बना देती है और हरएक सरकारी नौकर को उसका पालन करना पड़ता है। सरकार की पहली नीति यह है कि वह दिन-दिन अधिक संगठित और दृढ़ हों। इसके लिए स्वाधीनता के भावों का दमन करना जरूरी है; अगर कोई मजिस्ट्रेट इस नीति के विरूद्ध काम करता है, तो वह मजिस्ट्रेट न रहेगा। वह हिन्दुस्तानी था, जिसने तुम्हारे बाबूजी को जरा-सी बात पर तीन साल की सजा दे दी। इसी सजा ने उनके प्राण लिये बेटा, मेरी इतनी बात मानो। सरकारी पदों पर न गिरो। मुझे यह मंजूर है कि तुम मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की कुछ सेवा करो, इसके बदले कि तुम हाकिम बन जाओ और शान से जीवन बिताओ। यह समझ लो कि जिस दिन तुम हाकिम की कुरसी पर बैठोगे, उस दिन से तुम्हारा दिमाग हाकिमों का-सा हो जाएगा। तुम यही चाहेगे कि अफसरों में तुम्हारी नेकनामी और तरक्की हो। एक गँवारू मिसाल लो। लड़की जब तक मैके में क्वॉँरी रहती है, वह अपने को उसी घर की समझती है, लेकिन जिस दिन ससुराल चली जाती है, वह अपने घर को दूसरो का घर समझने लगती है। मॉँ-बाप, भाई-बंद सब वही रहते हैं, लेकिन वह घर अपना नहीं रहता। यही दुनिया का दस्तूर है।
प्रकाश ने खीझकर कहा—तो क्या आप यही चाहती हैं कि मैं जिंदगी-भर चारों तरफ ठोकरें खाता फिरूँ?
करुणा कठोर नेत्रों से देखकर बोली—अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो मैं कहूँगी, ठोकर खाना अच्छा है।
प्रकाश ने निश्चयात्मक भाव से पूछा—तो आपकी यही इच्छा है?
करूणा ने उसी स्वर में उत्तर दिया—हॉँ, मेरी यही इच्छा है।
प्रकाश ने कुछ जवाब न दिया। उठकर बाहर चला गया और तुरन्त रजिस्ट्रार को इनकारी-पत्र लिख भेजा; मगर उसी क्षण से मानों उसके सिर पर विपत्ति ने आसन जमा लिया। विरक्त और विमन अपने कमरें में पड़ा रहता, न कहीं घूमने जाता, न किसी से मिलता। मुँह लटकाए भीतर आता और फिर बाहर चला जाता, यहॉँ तक महीना गुजर गया। न चेहरे पर वह लाली रही, न वह ओज; ऑंखें अनाथों के मुख की भाँति याचना से भरी हुई, ओठ हँसना भूल गए, मानों उन इनकारी-पत्र के साथ उसकी सारी सजीवता, और चपलता, सारी सरलता बिदा हो गई। करूणा उसके मनोभाव समझती थी और उसके शोक को भुलाने की चेष्टा करती थी, पर रूठे देवता प्रसन्न न होते थे।
आखिर एक दिन उसने प्रकाश से कहा—बेटा, अगर तुमने विलायत जाने की ठान ही ली है, तो चले जाओ। मना न करूँगी। मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें रोका। अगर मैं जानती कि तुम्हें इतना आघात पहुँचेगा, तो कभी न रोकती। मैंने तो केवल इस विचार से रोका था कि तुम्हें जाति-सेवा में मग्न देखकर तुम्हारे बाबूजी की आत्मा प्रसन्न होगी। उन्होंने चलते समय यही वसीयत की थी।
प्रकाश ने रूखाई से जवाब दिया—अब क्या जाऊँगा! इनकारी-खत लिख चुका। मेरे लिए कोई अब तक बैठा थोड़े ही होगा। कोई दूसरा लड़का चुन लिया होगा और फिर करना ही क्या है? जब आपकी मर्जी है कि गॉँव-गॉँव की खाक छानता फिरूँ, तो वही सही।
करूणा का गर्व चूर-चूर हो गया। इस अनुमति से उसने बाधा का काम लेना चाहा था; पर सफल न हुई। बोली—अभी कोई न चुना गया होगा। लिख दो, मैं जाने को तैयार हूं।
प्रकाश ने झुंझलाकर कहा—अब कुछ नहीं हो सकता। लोग हँसी उड़ाऍंगे। मैंने तय कर लिया है कि जीवन को आपकी इच्छा के अनुकूल बनाऊँगा।
करूणा—तुमने अगर शुद्ध मन से यह इरादा किया होता, तो यों न रहते। तुम मुझसे सत्याग्रह कर रहे हो; अगर मन को दबाकर, मुझे अपनी राह का काँटा समझकर तुमने मेरी इच्छा पूरी भी की, तो क्या? मैं तो जब जानती कि तुम्हारे मन में आप-ही-आप सेवा का भाव उत्पन्न होता। तुम आप ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो।
प्रकाश—अब मैं नहीं लिख सकता।
‘तो इसी शोक में तने बैठे रहोगे?’
‘लाचारी है।‘
करूणा ने और कुछ न कहा। जरा देर में प्रकाश ने देखा कि वह कहीं जा रही है; मगर वह कुछ बोला नहीं। करूणा के लिए बाहर आना-जाना कोई असाधारण बात न थी; लेकिन जब संध्या हो गई और करुणा न आयी, तो प्रकाश को चिन्ता होने लगी। अम्मा कहॉँ गयीं? यह प्रश्न बार-बार उसके मन में उठने लगा।
प्रकाश सारी रात द्वार पर बैठा रहा। भॉँति-भॉँति की शंकाऍं मन में उठने लगीं। उसे अब याद आया, चलते समय करूणा कितनी उदास थी; उसकी आंखे कितनी लाल थी। यह बातें प्रकाश को उस समय क्यों न नजर आई? वह क्यों स्वार्थ में अंधा हो गया था?
हॉँ, अब प्रकाश को याद आया—माता ने साफ-सुथरे कपड़े पहने थे। उनके हाथ में छतरी भी थी। तो क्या वह कहीं बहुत दूर गयी हैं? किससे पूछे? अनिष्ट के भय से प्रकाश रोने लगा।
श्रावण की अँधेरी भयानक रात थी। आकाश में श्याम मेघमालाऍं, भीषण स्वप्न की भॉँति छाई हुई थीं। प्रकाश रह-रहकार आकाश की ओर देखता था, मानो करूणा उन्हीं मेघमालाओं में छिपी बैठी हे। उसने निश्चय किया, सवेरा होते ही मॉँ को खोजने चलूँगा और अगर....
किसी ने द्वार खटखटाया। प्रकाश ने दौड़कर खोल, तो देखा, करूणा खड़ी है। उसका मुख-मंडल इतना खोया हुआ, इतना करूण था, जैसे आज ही उसका सोहाग उठ गया है, जैसे संसार में अब उसके लिए कुछ नहीं रहा, जैसे वह नदी के किनारे खड़ी अपनी लदी हुई नाव को डूबते देख रही है और कुछ कर नहीं सकती।
प्रकाश ने अधीर होकर पूछा—अम्मॉँ कहॉँ चली गई थीं? बहुत देर लगाई?
करूणा ने भूमि की ओर ताकते हुए जवाब दिया—एक काम से गई थी। देर हो गई।
यह कहते हुए उसने प्रकाश के सामने एक बंद लिफाफा फेंक दिया। प्रकाश ने उत्सुक होकर लिफाफा उठा लिया। ऊपर ही विद्यालय की मुहर थी। तुरन्त ही लिफाफा खोलकर पढ़ा। हलकी-सी लालिमा चेहरे पर दौड़ गयी। पूछा—यह तुम्हें कहॉँ मिल गया अम्मा?
करूणा—तुम्हारे रजिस्ट्रार के पास से लाई हूँ।
‘क्या तुम वहॉँ चली गई थी?’
‘और क्या करती।‘
‘कल तो गाड़ी का समय न था?’
‘मोटर ले ली थी।‘
प्रकाश एक क्षण तक मौन खड़ा रहा, फिर कुंठित स्वर में बोला—जब तुम्हारी इच्छा नहीं है तो मुझे क्यों भेज रही हो?
करूणा ने विरक्त भाव से कहा—इसलिए कि तुम्हारी जाने की इच्छा है। तुम्हारा यह मलिन वेश नहीं देखा जाता। अपने जीवन के बीस वर्ष तुम्हारी हितकामना पर अर्पित कर दिए; अब तुम्हारी महत्त्वाकांक्षा की हत्या नहीं कर सकती। तुम्हारी यात्रा सफल हो, यही हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
करूणा का कंठ रूँध गया और कुछ न कह सकी।

~~5~~

प्रकाश उसी दिन से यात्रा की तैयारियॉँ करने लगा। करूणा के पास जो कुछ था, वह सब खर्च हो गया। कुछ ऋण भी लेना पड़ा। नए सूट बने, सूटकेस लिए गए। प्रकाश अपनी धुन में मस्त था। कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर
आता, कभी किसी चीज का।
करूणा इस एक सप्ताह में इतनी दुर्बल हो गयी है, उसके बालों पर कितनी सफेदी आ गयी है, चेहरे पर कितनी झुर्रियॉँ पड़ गई हैं, यह उसे कुछ न नजर आता। उसकी ऑंखों में इंगलैंड के दृश्य समाये हुए थे। महत्त्वाकांक्षा ऑंखों पर परदा डाल देती है।
प्रस्थान का दिन आया। आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी। करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को बाहर निकाल रही थी। उनकी गाढ़े की चादरें, खद्दर के कुरते, पाजामें और लिहाफ अभी तक सन्दूक में संचित थे। प्रतिवर्ष वे धूप में सुखाये जाते और झाड़-पोंछकर रख दिये जाते थे। करूणा ने आज फिर उन कपड़ो को निकाला, मगर सुखाकर रखने के लिए नहीं गरीबों में बॉँट देने के लिए। वह आज पति से नाराज है। वह लुटिया, डोर और घड़ी, जो आदित्य की चिरसंगिनी थीं और जिनकी बीस वर्ष से करूणा ने उपासना की थी, आज निकालकर ऑंगन में फेंक दी गई; वह झोली जो बरसों आदित्य के कन्धों पर आरूढ़ रह चुकी थी, आप कूड़े में डाल दी गई; वह चित्र जिसके सामने बीस वर्ष से करूणा सिर झुकाती थी, आज वही निर्दयता से भूमि पर डाल दिया गया। पति का कोई स्मृति-चिन्ह वह अब अपने घर में नहीं रखना चाहती। उसका अन्त:करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो गया है और पति के सिवा वह किस पर क्रोध उतारे? कौन उसका अपना हैं? वह किससे अपनी व्यथा कहे? किसे अपनी छाती चीरकर दिखाए? वह होते तो क्या आप प्रकाश दासता की जंजीर गले में डालकर फूला न समाता? उसे कौन समझाए कि आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते।
प्रकाश के मित्रों ने आज उसे विदाई का भोज दिया था। वहॉँ से वह संध्या समय कई मित्रों के साथ मोटर पर लौटा। सफर का सामान मोटर पर रख दिया गया, तब वह अन्दर आकर मॉँ से बोला—अम्मा, जाता हूँ। बम्बई पहूँचकर पत्र लिखूँगा। तुम्हें मेरी कसम, रोना मत और मेरे खतों का जवाब बराबर देना।
जैसे किसी लाश को बाहर निकालते समय सम्बन्धियों का धैर्य छूट जाता है, रूके हुए ऑंसू निकल पड़ते हैं और शोक की तरंगें उठने लगती हैं, वही दशा करूणा की हुई। कलेजे में एक हाहाकार हुआ, जिसने उसकी दुर्बल आत्मा के एक-एक अणु को कंपा दिया। मालूम हुआ, पॉँव पानी में फिसल गया है और वह लहरों में बही जा रही है। उसके मुख से शोक या आर्शीवाद का एक शब्द भी न निकला। प्रकाश ने उसके चरण छुए, अश्रू-जल से माता के चरणों को पखारा, फिर बाहर चला। करूणा पाषाण मूर्ति की भॉँति खड़ी थी।
सहसा ग्वाले ने आकर कहा—बहूजी, भइया चले गए। बहुत रोते थे।
तब करूणा की समाधि टूटी। देखा, सामने कोई नहीं है। घर में मृत्यु का-सा सन्नाटा छाया हुआ है, और मानो हृदय की गति बन्द हो गई है।
सहसा करूणा की दृष्टि ऊपर उठ गई। उसने देखा कि आदित्य अपनी गोद में प्रकाश की निर्जीव देह लिए खड़े हो रहे हैं। करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी।
6
करूणा जीवित थी, पर संसार से उसका कोई नाता न था। उसका छोटा-सा संसार, जिसे उसने अपनी कल्पनाओं के हृदय में रचा था, स्वप्न की भॉँति अनन्त में विलीन हो गया था। जिस प्रकाश को सामने देखकर वह जीवन की अँधेरी रात में भी हृदय में आशाओं की सम्पत्ति लिये जी रही थी, वह बुझ गया और सम्पत्ति लुट गई। अब न कोई आश्रय था और न उसकी जरूरत। जिन गउओं को वह दोनों वक्त अपने हाथों से दाना-चारा देती और सहलाती थी, वे अब खूँटे पर बँधी निराश नेत्रों से द्वार की ओर ताकती रहती थीं। बछड़ो को गले लगाकर पुचकारने वाला अब कोई न था, जिसके लिए दुध दुहे, मुट्ठा निकाले। खानेवाला कौन था? करूणा ने अपने छोटे-से संसार को अपने ही अंदर समेट लिया था।
किन्तु एक ही सप्ताह में करूणा के जीवन ने फिर रंग बदला। उसका छोटा-सा संसार फैलते-फैलते विश्वव्यापी हो गया। जिस लंगर ने नौका को तट से एक केन्द्र पर बॉँध रखा था, वह उखड़ गया। अब नौका सागर के अशेष विस्तार में भ्रमण करेगी, चाहे वह उद्दाम तरंगों के वक्ष में ही क्यों न विलीन हो जाए।
करूणा द्वार पर आ बैठती और मुहल्ले-भर के लड़कों को जमा करके दूध पिलाती। दोपहर तक मक्खन निकालती और वह मक्खन मुहल्ले के लड़के खाते। फिर भॉँति-भॉँति के पकवान बनाती और कुत्तों को खिलाती। अब यही उसका नित्य का नियम हो गया। चिड़ियॉँ, कुत्ते, बिल्लियॉँ चींटे-चीटियॉँ सब अपने हो गए। प्रेम का वह द्वार अब किसी के लिए बन्द न था। उस अंगुल-भर जगह में, जो प्रकाश के लिए भी काफी न थी, अब समस्त संसार समा गया था।
एक दिन प्रकाश का पत्र आया। करूणा ने उसे उठाकर फेंक दिया। फिर थोड़ी देर के बाद उसे उठाकर फाड़ डाला और चिड़ियों को दाना चुगाने लगी; मगर जब निशा-योगिनी ने अपनी धूनी जलायी और वेदनाऍं उससे वरदान मॉँगने के लिए विकल हो-होकर चलीं, तो करूणा की मनोवेदना भी सजग हो उठी—प्रकाश का पत्र पढ़ने के लिए उसका मन व्याकुल हो उठा। उसने सोचा, प्रकाश मेरा कौन है? मेरा उससे क्य प्रयोजन? हॉँ, प्रकाश मेरा कौन है? हाँ, प्रकाश मेरा कौन है? हृदय ने उत्तर दिया, प्रकाश तेरा सर्वस्व है, वह तेरे उस अमर प्रेम की निशानी है, जिससे तू सदैव के लिए वंचित हो गई। वह तेरे प्राण है, तेरे जीवन-दीपक का प्रकाश, तेरी वंचित कामनाओं का माधुर्य, तेरे अश्रूजल में विहार करने वाला करने वाला हंस। करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गये हों। एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक पदचिन्ह-सा मालूम होता था। जब सारे पुरजे जमा हो गए, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो। हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन पुरजों को जोड़ने में लगी रही। पत्र दोनों ओर लिखा था, इसलिए पुरजों को ठीक स्थान पर रखना और भी कठिन था। कोई शब्द, कोई वाक्य बीच में गायब हो जाता। उस एक टुकड़े को वह फिर खोजने लगती। सारी रात बीत गई, पर पत्र अभी तक अपूर्ण था।
दिन चढ़ आया, मुहल्ले के लौंड़े मक्खन और दूध की चाह में एकत्र हो गए, कुत्तों ओर बिल्लियों का आगमन हुआ, चिड़ियॉँ आ-आकर आंगन में फुदकने लगीं, कोई ओखली पर बैठी, कोई तुलसी के चौतरे पर, पर करूणा को सिर उठाने तक की फुरसत नहीं।
दोपहर हुआ, करुणा ने सिर न उठाया। न भूख थीं, न प्यास। फिर संध्या हो गई। पर वह पत्र अभी तक अधूरा था। पत्र का आशय समझ में आ रहा था—प्रकाश का जहाज कहीं-से-कहीं जा रहा है। उसके हृदय में कुछ उठा हुआ है। क्या उठा हुआ है, यह करुणा न सोच सकी? करूणा पुत्र की लेखनी से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी।
इस भॉँति तीन दिन गूजर गए। सन्ध्या हो गई थी। तीन दिन की जागी ऑंखें जरा झपक गई। करूणा ने देखा, एक लम्बा-चौड़ा कमरा है, उसमें मेजें और कुर्सियॉँ लगी हुई हैं, बीच में ऊँचे मंच पर कोई आदमी बैठा हुआ है। करूणा ने ध्यान से देखा, प्रकाश था।
एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पॉँव में जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे।
करूणा की आंखें खुल गई। ऑंसू बहने लगे। उसने पत्र के टुकड़ों को फिर समेट लिया और उसे जलाकर राख कर डाला। राख की एक चुटकी के सिवा वहॉँ कुछ न रहा, जो उसके हृदय में विदीर्ण किए डालती थी। इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन, उसका संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया।
प्रात:काल लोगों ने देखा, पक्षी पिंजड़े में उड़ चुका था! आदित्य का चित्र अब भी उसके शून्य हृदय से चिपटा हुआ था। भग्नहृदय पति की स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था।

Archan

अर्चन
किसी की महत्ता मानते हुए श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करने की क्रिया या भाव


अर्चन - पूजन, वंदन, उपासना को अर्चन कहते है. तथा वंदना या प्रार्थना को अर्चना कहते है |  

प्रातः स्मरणीय श्लोक, वन्दनाएं  तथा स्त्रोत का अध्ययन करने हेतु एक नया ब्लॉग बनाया है. आप भी अपना सहयोग दे. आपके क्षेत्र में प्रचलित दोहे, वंदना, भजन, प्रार्थनाओं को संकलित कर भेजे

Mulla Nasruddin | मुल्ला नसरुद्दीन


मुल्ला नसरुद्दीन होजा तुर्की (और संभवतः सभी इस्लामी देशों का) सबसे प्रसिद्द विनोद चरित्र है। तुर्की भाषा में होजा शब्द का अर्थ है शिक्षक या स्कॉलर। उसकी चतुराई और वाकपटुता के किस्से संभवतः किसी वास्तविक इमाम पर आधारित हैं। कहा जाता है की उसका जन्म वर्ष १२०८ में तुर्की के होरतो नामक एक गाँव में हुआ था और वर्ष १२३७ में वह अक्सेहिर नामक मध्यकालीन नगर में बस गया जहाँ हिजरी वर्ष ६८३ (ईसवी १२८५) में उसकी मृत्यु हो गई। मुल्ला नसरुद्दीन के इर्दगिर्द लगभग ३५० कथाएँ और प्रसंग घुमते हैं जिनमें से बहुतों की सत्यता संदिग्ध है।


मुल्ला नसरूदीन कहानियों की दुनिया का एक ऐसा पात्र था, जो सूदखोरों, जबरन कर वसूल करने वालों तथा दुष्ट दरबारियों का कट्टर दुश्मन था | वह एक नेकदिल इंसान था, जो जुल्म करने वालों को अपनी बुद्धिमानी से ऐसा सबक सिखाता था की वे जिंदगी-भर नहीं भूलते थे | गरीब लागों के हक़ की लड़ाई लड़ने को वह हमेशा तैयार रहता था | दस वर्षों तक तेहरान, बगदाद और दूसरों शहरों में भटकने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन जब अपने मुल्क बुखारा लौटा तो वह फैली अव्यवस्था के कारन जालिमों से बदला लेने के लिए मैदान में कूद पड़ा | उसका एकमात्र साथी उसका गधा था | उसने निर्धन, अनाथ लोगों को आश्रय दिया तथा अमीरों, सरदारों आदि से अपने बुद्धिबल से दौलत लूटकर गरीबों में बांटी | मुल्ला नासुद्दीन का जिक्र आते ही मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती हैं, जो अपने गधे को साथ लिए यहाँ-वहां घूमता रहता हैं और मसखरेपन से भरपूर हरकते करता रहता हैं, किन्तु इन हरकतों की गहराई में जाने पर भेद खुलता हैं की उसने हंसी-ही-हंसी में कितना बड़ा कारनामा कर डाला हैं |
मुल्ला नसरुद्दीन! बुखारा का मनमौजी-फक्कड इंसान, यातीमों और गरीबों का सहारा, सूदखोरों और जबरन टैक्स वसूल करने वालों का कट्टर दुश्मन….. और बुखारा के अमीर की आखों में चुभने वाला कांटा था.


-1-
सूरज का गोला पश्चिम की पहाडियों के पीछे छिप गया था. सूरज छिपने के बाद मशरिक, मगरिब, सुमाल और जुनूब में फैली सुर्खी भी धीरे-धीरे सिमटने लगी थी. फिजा में ऊंटों के गले में बंधी घंटी की घनघनाहट गूंज रही थी.

एक काफिला बडी तेजी के साथ बुखारा शहर की तरफ बढा जा रहा था. काफिले में सबसे पीछे एक गधे पर सवार जो शख्स था, वह गर्दों-गुब्बार में इस तरह लथपथ हो चुका था कि उसके तमाम बदन पर गर्द की एक मोटी तह जम चुकी थी जिससे उसका चेहरा तक पहचान में न आता था.

दीन-हीन हालत में काफिले के पीछे गधे पर सवार चला आ रहा यह शख्स कोई और नहीं, Mulla Nasruddin था, मुल्ला नसरुद्दीन! अपने वफादार गधे के साथ शहर दर शहर खाक छानते हुए वह दस बरस से अपने मादरे-वतन बुखारा से दूर रहा था, लेकिन उसकी आखों में हमेशा अपने वतन के मासूम लोगों की चीखों-पुकार, अमीर-उमरावों केे जुल्म कौंधते रहते थे. दस वर्षों में वह बगदाद, इस्तांबुल, बख्शी सराय, तेहरान तिफलिस, अखमेज और दमिष्क जैसे सभी मुल्कों में घुम आया था.

वह जहां भी जाता, गरीबों का मुहाफिज और जुल्म करने वाले अमीर-उमरावों का दुश्मन बन जाता. वह गरीबों और यातीमों के दिलों में कभी न भुलाई जाने वाली यादें और जुल्म के पैरोकारों के दिलों में खौफ के साए छोड जाता.

अब वह अपने प्यारे वतन बुखारा लौट रहा था, ताकि बरसों से भटकती अपनी जिंदगी को वह कुछ चैन-सुकुन भरे ठहराव के पल दे सके. काफिले के पीछे चल रहा मुल्ला नसरुद्दीन हालांकि गर्दों-बुब्बार में पूरी तरह लथपथ हो चुका था मगर फिर भी वह खुष था.

इस धूल-मिट्टी से उसे सोंधी-सोंधी खुशबु आती महसूस हो रही थी, आखिर यह मिट्टी उसके अपने प्यारे वतन बुखारा की जो थी. काफिला जिस वक्त शहर की चारदीवारी के करीब पहुंचा, फाटक पर तैनात पहरेदार फाटक बंद कर रहे थे.

काफिले से सरदार ने दूर से ही मोहरों से भरी थैली ऊपर उठाते हुए चिल्लाकर पहरेदारों से कहा- खुदा के वास्ते रुकों, हमारा इंतजार करो.

हवा की सांय-सांय और घंटियों की घनघनाहट में पहरेदार उनकी आवाज न सुन सके और फासला होने के कारण उन्हें मोहरों से भरी थैली भी दिखाई न दी.

फाटक बंद कर दिए गए- अंदर से मोटी-मोटी सांकलें लगा दी गई और पहरेदार बुर्जियों पर चढकर तोपों पर तैनात हो गए. धीरे-धीरे अंधेरा फैलना शुरू हो गया था. हवा में तेजी के साथ-साथ कुछ ठंडक भी बढने लगी थी.

आसमान पर सितारों की टिमटिमाहट के बीच दूज का चांद चमकने लगा था. सरदार ने काफिले को वहीं चार दीवारी के पास ही डेरा डालने का हुक्म दे दिया. बुखारा शहर की मस्जिदों की ऊंची-ऊंची मीनारो से झुटपुटे की उस ख़ामोशी में अजान की तेज-तेज आवाजें आने लगीे.

अजान की आवाज सुनकर काफिले के सभी लोग नमाज के लिए इकठ्ठा होने लगे मगर मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे के साथ एक ओर को खिसक लिया.

वह अपने गधे के साथ चलते हूए कहने लगा – ऐं मेरे प्यारे गधे! काफिले के इन लोगों को तो खुदा ने सब कुछ अदा किया है जिसके लिए ये व्यापारी नमाज पढकर खुदा का शुक्रिया अदा करें.

ये लोग शाम का खाना खा चुके हैं और अभी थोडी देर बाद रात का खाना खाएंगें. मेरे वफादार गधे! मैं और तू तो अभी भूखे है.

हमें न तो शाम का खाना मिला हैं और न ही अब रात को मिलेगा. शुक्रिया चाहता हैं तो मेरे लिए पुलाव की तष्तरी और तेरे लिए एक गट्ठर तिपतियां वाला घांस भिजवा दे.

काफिले से काफी दूर आकर उसने अपने गधे को पगडंडी के किनारे एक पेड से बांध दिया और पास ही एक पत्थर अपने सिरहाने रखकर नंगी जमीन पर लेट गया. ऊपर टिमटिमाते सितारों का जाल सा बुना हुआ थां.

पिछले दस सालों से अक्सर इन सितारों को देखते-देखते उसकी अच्छी खासी जान-पहचान हो गई थी.

अक्सर वह इन सितारों को निहारता रहता था. कभी बगदाद से, कभी इंस्ताबुल से, कभी दमिष्क से तो कभी तेहरान से. तमाम शहरों से उसे आसमान और आसमान पर टिमटिमाते हुए सितारे एक ही जैसे लगते थे.

वही गहरा औश्र खामोश-सा आसमान और वही टिम-टिम करते जाने-पहचाने सितारे. दुनिया-भर के शहरों में सरहद ने आकर जो गहरी-गहरी अपने-पराए की खाई खोदी हुई हैं, ऐसा कुछ भी आसमान और उसके सितारों के दरम्यां उसने कभी महसूस न किया था.

उसे हमेशा यही लगता कि रातों की शांत व पवित्र दुआओं की आवाजे उसे बडे धनवानों से भी धनवान बना देती थी और आखिर वह खुद को धनवान महसूस करे भी क्यों नहीे. उसे वह सब कुछ हासिल था, जो दुनिया के बडे-बडे रईसों को भी हासिल न था.

इस दुनिया में हर आदमी का अपना-अपना नसीब होता है. भले ही अमीर लोग सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खाऐं, लेकिन वे अपनी सभी रातें छत के नीचे गुजारने को ही मजबुर हैं.

इस तरह (मुल्ला नसरुद्दीन की तरह) सर्द और सितारों भरे आसमान को निहारते हुए और कल्पना की उडान भरते हुए अमीर लोग कभी भी सोचने का मौंका नहीं जुटा सकते-ऐसा उन बेचारों का नसीब कहां, जो उन्हें इस तरह की सहूलियत मिल सकें.

एकजुट होकर नमाज अदा करते लोग अपनी इबादत पूरी करके अपने-अपने खेमों में भोजन की व्यवस्था में जुट गए. चारदीवारी के बाहर बडे-बडे कहाडों के नीचे आग जलने लगी.

जिबह के लिए तैयार भेडें और बकरीयां बुरी तरह मिमियां उठी. कहाडों के नीचे जलती आग ने भुनते हुए मसालों की गंध हवा में बिखेर दी. मुल्ला नसरुद्दीन हवा के रूख को पहचानकर, उस जगह पर जा लेटा, जहां पर यह भूख जगाने वाली खाने की गंध न पहुंच सके.

तारों को निहारता हुआ वह सोच रहा था कि कल जब वह बुखारा शहर में वह प्रवेश करेगा तो उसे फाटक पर ही चूंगी अदा करनी होगीं हालांकि उसे बुखारा छोडे दस बरस बीत चुके थे मगर अभी तक उसे बुखारा के सभी रिवाजों की पुरी जानकारी थी.

उसने यही सोचकर अपनी रकम का आखिरी हिस्सा बचाकर रख छोडा था. वह दुनिया के भले ही किसी भी मुल्क में रहा हो, उसे अपने बुखारा की और बुखारा के रीति-रिवाजों की हमेशा याद आती रहती थी. लेटा-लेटा वह अपने प्यारे वतन की याद में खो गया.

उसे अपने वतन से बेहद प्यार था. धूप से तपे तांबई चेहरे पर काली दाढी और साफ आंखों वाला खुषमिजाज मुल्ला नसरुद्दीन तेल की चिकनाई से सनी पगडी, पैंबंद लगे कोट और फटे जूतें पहने अपने वतन से जितनी दूर होता, वतन के लिए उसके दिल में उतना ही प्यार उमडता.

उसे अपने बुखारा की ऊंची-ऊंची मिनारें, चरागाह, खेत, गांव और रेगिस्तान खूब याद आते थें। उसे पता चल चुका था कि पुराना अमीर गारत हो चुका है, लेकिन उसके बाद बना नया उससे भी काईयां और संगदिल था।

इस नए अमीर ने पहले अमीर से भी ज्यादा आवाम पर जुल्मों-सितम ढा रखे थे. आवाम को तरह-तरह की चुंगी लगाकर लुटा जा रहा था. वैसे नया अमीर बडा ही धार्मिक था.

वह साल में दो बार शेख बहाउद्दीन की पवित्र दरगाह पर सजदा करने जाता था, जो बुखारा शहर के पास ही थी. लुट-खसोट पुरे जोरों पर थी. खेत-खलिहान सुखकर जल चुके थे. धरती में दारारें पड गई थी. दस्तकारियां समाप्त हो चुकी थी और व्यापार लगातार घटता जा रहा था.

मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचते-सोचते एक गहरी सांस ली और करवट बदलकर फिर अपनी सोचों में गुम हो गया. सुबह की अजान के साथ ही पूरा कारवां उठ गया. ऊँट वालों ने सामान ऊंटों पर लादना शुरू कर दिया. सौदागर अपनी पगडियां दुरुस्त करने लगे.

नसरुद्दीन भी उठा, सबसे पहले अपनी अंटी में खुंसी थैली टटोली, वह सलामत थी, फिर अपने गधे के करीब आकर उसकी पीठ पर हाथ फेरा- ऐ मेरे वफादार गधे! चल, अपने मुल्क में दाखिल होने का मुबारक वक्त आ गया है.

ऊंटों के गले की घंटियां बज उठी और कारवां फाटक की ओर बढ गया. फाटक में दाखिल होते ही सब एक ओर रुक गए. पुरी सडक पहरेदारों ने घेरी हुई थी.

सिपाहियों की तादाद भी काफी थी। कुछ तो कायदे से वर्दियां पहने थे, मगर कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें वर्दी पहनने का सलीका तक न था. अमीर की नौकरी में अभी वे नए थे और उन्हें रिशवत खोरी का पूरा मौका नहीं मिला था.

वे चीख-चिल्ला रहे थे, उस लूट के लिए लडाई-झगडा और धक्का-मुक्की कर रहे थे, जो उन्हें व्यापारियों से हासिल होने वाली थी. फाटक के करीब ही एक चाय की दुकान थी.

वर्दी पहने अफसर-सा दिखाई देने वाला एक तुंदियल व्यक्ति बाहर आया. उसके पैरां मे जूतियां थी. उसके मोटे और थुलथुले चेहरे पर अय्याशी, बदकारी और जलालत के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे.

उसने एक ललचाई नजर से व्यापारियों की ओर देखा, फिर बोला- हे सौदागरों! बुखारा में तुम्हारा स्वागत है. खुदा करें तुम्हे अपने काम में…..अपने इरादों में कामयाबी हासिल हो. ऐ व्यापारियों!

आपको यह इल्म होना चाहिए कि अमीर का हुक्म हैं कि जो सौदागर अपने माल का मामूली-सा हिस्सा भी छिपाने की कोशिश करेगा, उसे बेंत लगा-लगाकर मार डाला जाएगा.

यह सुनकर व्यापारी कुछ विचलित हुए और परेशानी की हालत में रंगी दाढियां सहलाने लगे. कर अधिकारी बडी मशक्कत के बाद पहरेदारों की ओर पलटकर बोला – ऐं बुखारा के वफादारों! अपना काम शुरू करो.

आदेश पाते ही सिपाही चीखते-चिल्लाते ऊंटों पर झपट पडे. वे खुषी से चीख-चिल्ला रहे थे, जैसे किसी लूट में शरीक हो रहे हो. और अधिक से अधिक माल एक-दूसरे से पहले लूट लेना चाहते हों.

सन के मोटे-मोटे रस्से उन्होंने अपनी तलवारों से काट डाले और देखते ही देखते सामान की गाठें खोल डाली. सडक पर कीमती सामान बिखरा दिखाई देने लगा, इसमें कीमती कपडों के थान, चाय, काली मिर्च, कपूर, गुलाब के इत्र की शीशियां तथा तिब्बती औषधियों के डिब्बे थे.

व्यापारी बेबस से खडे सिपाहियों की लूट-खसोट करते देख रहे थे. जिसके मन में जो आ रहा था, वह एक-दूसरे की नजर बचाकर अपनी जेब के हवाले कर रहा था. केवल दो घडी……।

यह सिलसिला केवल दो घडी चला, फिर सभी सिपाही कर अधिकारी के पीछे जाकर खडे हो गए. लूट के माल से भरी उनकी जेबें फटी जा रही थी. फिर शुरू हुई शहर मे आने और सामान लाने की वसूली.

गधा और गधे के रिश्तेदार बुखारा में दाखिल होते समय व्यापार के लिए मुल्ला नसरुद्दीन के पास कोई सामान न था उसे तो सिर्फ शहर में दाखिल होने का Tax अदा करना था.

अधिकारी ने पुछा – तुम कहाँ से आए हो और आने का सबब क्या है ? मुहर्रिर ने सींग से भरी स्याही में नेजे की कलम डुबोई और मुल्ला नसरुद्दीन का बयान दर्ज करने के लिए तैयार हो गया।

मुल्ला नसरुद्दीन ने बताया – हुजूरे आला! मैं ईरान से आया हूं. बुखारा मेरे कुछ संबंधी रहते हेैं, उन्हीं से मिलने आया हूं. यह सुनकर अधिकारी ने कहा – अच्छा तो तुम अपने संबंधियों से मिलने आए हो, तुम्हें मिलने वालों का कर अदा करना पडेंगा.

लेकिन हुजूर! मैं उनसे मिलूंगा नहीं. मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा – मैं तो एक जरुरी काम से आया हूं. काम से आए हो ? अधिकारी चीखा, उसकी आखों में चमक उभर आई – इसका मतलब हैं कि तुम अपने रिश्तेदारो से भी मिलोगे और काम भी निबटाओेगे.

तुम्हे दोनों कर अदा करने पडेंगे, मिलने वालों का भी और काम का भी. इसके अलावा उस अल्लाह के सम्मान में मस्जिदों की आराइश के लिए अतिया अदा करों जिस अल्लाह ने रास्ते में डकैतों से तुम्हारी हिफाजत की.

मुल्ला नसरुद्दीन ने सोचा – मैं चाहता था कि वह अल्लाह इस समय मेरी इन मुफ्तखोरों से हिफाजत करता, डकैतों से बचाव तो मैं खुद कर लेता, लेकिन वह खामोष ही रहा क्योंकि उसे मालूम था कि इस बातचीत के प्रत्येक शब्द का मूल्य उसे दस तंके देकर चुकाना पडेगा.

उसने चुपचाप अपनी अंटी में से थैली निकालकर शहर में दाखिले का, रिष्तेदारो का, व्यापार का तथा मस्जिदों का कर अदा किया. सिपाही इस फिराक में आगे को झुक-झुककर देख रहे थे कि देखें इसके पास कितनी रकम है, मगर जब कर अधिकारी ने उन्हें सख्त निगाह से घूरा तो वे पीछे हट गए.

मुहर्रिर कीे नेजे की कलम तेजी से रजिस्टर पर चल रही थी।

कर अदा करने के बाद भी नसरुदीन की थैली में कुछ तंके बच गए थे। कर अधिकारी की आखों में वे तंके खटक रहे थे और वह तेजी से सोच रहा था कि वह तंके भी इससे कैसे हथियाए जाऐ ?

कर अदा करने के बाद मुल्ला नसरुद्दीन चलने को हुआ तो अधिकारी चिल्लाया – ठहरों! मुल्ला नसरुद्दीन पलटकर उसका चेहरा देखने लगा. इस गधे का कर कौन अदा करेगा ?

यदि तुम अपने रिष्तेदारों से मिलने आए हो तो जाहिर हैं कि तुम्हारा गधा भी अपने रिष्तेदारों से मिलेगा, इसका कर अदा करो.

मुल्ला नसरुद्दीन ने फिर अपनी थैली का मूह खोला और बडी ही नम्रता से बोला – मेरे आका! आपने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया है. हकीकत में बुखारा में मेरे गधे के संबधियों की तादाद बहुत ज्यादा है, वरना जैसे यहां काम चल रहा हैं, उसे देखते हुए तो तुम्हारे अमीर बहुत पहले की तख्त से उतार दिए गए होते और मेरे हुजूर! आप अपने लालच की वजह से न जाने कब के सूली पर चढा दिए गए होते. इससे पहले कि कर अधिकारी उसकी बात का अर्थ समझ पाता, मुल्ला नसरुद्दीन उछलकर अपने गधे पर बैठा और उसे ऐड लगाकर सरपट दौडाता हुआ एक गली में जा घुसा.

वह लगातार अपने गधे का हौसला बढाते हुए कह रहा था-और तेज-और तेज मेरे वफादार दोस्त! जल्दी भाग वरना तेरे इस मालिक को एक और कर अपना ये सिर देकर चुकाना होगा-और तेज मेरे वफादार गधे, और तेज….। मुल्ला नसरुद्दीन का गधा भी अलग किस्म का था.

मालिक ना भी कहे तब भी वह हालात को देखकर अपनी चाल बदल लेता था, उसके लंबे और सतर्क कानों ने फटाक से आती चिल्लपों और कर अधिकारी की डकराहट सुन ली थी जो अपने सिपाहीयों उस शैतान को पकड लाने का आदेश दे रहा था.

जाओ जल्दी जाओ पकड कर लाओ उस काफिर को आखिर वह हौन है? हवा में तेरती इन आवाजों ने मुल्ला नसरुद्दीन के पैरों मे जेैसे बिजली भर दी हो वह किसी की भी परवाह किए बिना भागे जा रहा था.

वह इतनी तेजी से भाग रहा था कि मुल्ला नसरुद्दीन को भी अपने पांव उपर उठाने पड रहे थे. वह तो बिलकुल गधे की पीठ पर पडी जीन से चिपक गया था. उसकी बाजुऐं गधे की गर्दन से लिपटी हुई थी.

यह देखकर गली के कुत्ते डर और घबराहट के मारे भोंकने लगे कि या अल्लाह यह क्या बवाल आ गया? गली में घुमते घूमते मुर्गे-मुर्गीयां और उनके चुजें डर कर इधर-उधर भाग रहे थे. राहगीर अचरज से दिवारों के साथ सटकर खडे हो गये थै.

कौई समझ नही पा रहा था कि क्या मुसीबत है ? किसी की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. उधर कुछ सिपाही उसकी खोज में इधर-उधर निकल पडे थे. कर अधिकारी अभी तक क्रोध से थर-थरा रहा था. उसकी आखें लाल हो गई थी. और नथूने फडफडा रहे थे.

एक फांस की तरह उसके फलक मे फंसी हुई थी कि वह आजाद खयालात वाला निडर आदमी कहीं मुल्ला नसरुद्दीन तो नहीं था ? उधर लोग भी आपस में खुसफुसर करने लगे थे.

ये जवाब तो मुल्ला नसरुद्दीन के ही योग्य था दोपहर होते होते यह चर्चा पुरे शहर में पहूंच चुकी थी कि एक व्यक्ति ने द्वार पर एसी बात कही. जिसने भी सुना उसने यही कहा- ऐसा जवाब तो मुल्ला नसरुद्दीन ही दे सकता है.

मूल्ला के खयालिक पूलाव

एक बार अपने गधे पर सवार  मुल्ला नसरुद्दीन कहीं चला जा रहा था। कहाँ जा रहा था यह उसे खुद पता नहीं था। वह गधे की पीठ पर बैठा खयालिक पूलाव पका रहा था।

मैं चार दुकाने खरीदुंगा एक कुम्हार की, एक जीन साज की, एक दर्जी की, एक मोची की। हर दुकान में दो कारीगर रखुंगा- बस ! अपना काम तो सिर्फ पैसा बटोरना- बस फिर साल-दो-साल में रईस बन जाऊंगा – मकान ? हाँ मकान भी तो खरीदूंगा।

आह! डसमे एक बाग भी होगा। बाग में फव्वारे होंगे, पेड होंगे, पौधे होंगे, पेडों पर पिंजरें लटके होंगे, जिनमे चिडियां चह-चहा रही होंगी- शादी ? अरे हाँ भाई शादी भी करूंगा। ज्यादा नहीं बस दो शादीयां करूगा। हर बीवी से तीन या चार बार लडके हों
गे। वाह मजा आ जायेगा। फिर उनकी शादीयां………

अपने ही विचारों में गुम मुल्ला नसरुद्दीन को दिन में दिन-दुनिया की कोई खबर ही नहीं थी, उसका गधा किस ओर जा रहा था, इसका भी उसे कोई ईल्म नहीं था। वह तो बस अपने खयालों की दुनिया में खोया हुआ था। उसका गधा भी मालिक को लापरवाह जानकर अपनी बदकारी पर उतर आया था। सामने ही एक छोटी सी खाई पर पूल बना था
मगर वह शैतान पूल पर न जाकर दाईं ओर मुड गया। उसका ईरादा छलांग लगाकर खायी पार करने का था। और ऐसा ही उसने किया भी। उसने अपनी चाल और तेज की और दोडकर छलांग लगा दी।
उधर मूल्ला नसरूद्दीन अपने लडकों के खयालों में उलझा हुआ था। जब लडके बडे हो जायेंगे तो मैं उन्हें बुलाकर …..अरे! यह मैं हवा में क्यों उडा जा रहा हूं- या खुदा मेरे शरीर में पंख लग गये क्या? लेकिन  नहीं ऐसा कुछ नहीं था, इसका अहसास उसे तब हुआ जब वह बंदूक की गोली की भांति धरती पर आकर गिरा।

उसके हलख से एक तेज चीख निकल पडी। उसकी आखों के सामने सीतारे से गिरकर रह गये।
जल्द ही उसे वास्तविकता का अहसास हो गया।

और फिर धूल और गर्द से भरा कराहता हुआ जब वह उठा तो उसका गधा दोस्ताना अंदाज में कान हिलाता हुआ उसके करीब आकर खडा हो गया। दुनिया भर की मासुमियत उसके चेहरे पर झलक रही थी। उसने कुछ ऐसे अंदाज में आखें चिमचिमाई मानों अपने मालिक से कहना चाहता हो कि आओ मेरे आका! फिर से मेरी पीठ पर बैठों।
अबे नमक हराम, गुस्ताख मेरे बाप दादाओं के ना मालूम किन गुनाहां की सजा के रूप में तेरा मेरा साथ बना है। या मेरे खुदा! इस लकडबघें।ना जाने मूल्ला नसरूद्दीन उसे कितनी गालियां और देता कि तभी उसकी नजर वहीं एक टुटी हुई दीवार के पास बैठे कुछ लोगो पर पडी और वह खामोष हो गया।
परंपरा
कई लोगों की भीड़ में मुल्ला नसरुद्दीन नमाज़ अदा करने के दौरान आगे झुका. उस दिन उसने कुछ ऊंचा कुरता पहना हुआ था. आगे झुकने पर उसका कुरता ऊपर चढ़ गया और उसकी कमर का निचला हिस्सा झलकने लगा.

मुल्ला के पीछे बैठे आदमी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने मुल्ला के कुरते को थोड़ा नीचे खींच दिया.

मुल्ला ने फ़ौरन अपने आगे बैठे आदमी का कुरता नीचे खींच दिया.

आगेवाले आदमी ने पलटकर मुल्ला से हैरत से पूछा – “ये क्या करते हो मुल्ला?”

“मुझसे नहीं, पीछेवालों से पूछो” – मुल्ला ने कहा – “शुरुआत वहां से हुई है”.

मुल्ला नसरुद्दीन का भाषण

एक बार शहर के लोगों ने मुल्ला नसरुद्दीन को किसी विषय पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया. मुल्ला जब बोलने के लिए मंच पर गया तो उसने देखा कि वहां उसे सुनने के लिए आये लोग उत्साह में नहीं दिख रहे थे.

मुल्ला ने उनसे पूछा – “क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?”

श्रोताओं ने कहा – “नहीं.”

मुल्ला चिढ़ते हुए बोला – “मैं उन लोगों को कुछ भी नहीं सुनाना चाहता जो ये तक नहीं जानते कि मैं किस विषय पर बात करनेवाला हूँ.” – यह कहकर मुल्ला वहां से चलता बना.

भीड़ में मौजूद लोग यह सुनकर शर्मिंदा हुए और अगले हफ्ते मुल्ला को एक बार और भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने उनसे दुबारा वही सवाल पूछा – “क्या आप लोग जानते हैं कि मैं आपको किस विषय पर बताने जा रहा हूँ?”

लोग इस बार कोई गलती नहीं करना चाहते थे. सबने एक स्वर में कहा – “हाँ.”

मुल्ला फिर से चिढ़कर बोला – “यदि आप लोग इतने ही जानकार हैं तो मैं यहाँ आप सबका और अपना वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहता.” मुल्ला वापस चला गया.

लोगों ने आपस में बातचीत की और मुल्ला को तीसरी बार भाषण देने के लिए बुलाया. मुल्ला ने तीसरी बार उनसे वही सवाल पूछा. भीड़ में मौजूद लोग पहले ही तय कर चुके थे कि वे क्या जवाब देंगे. इस बार आधे लोगों ने ‘हां’ कहा और आधे लोगों ने ‘नहीं’ कहा.

मुल्ला ने उनका जवाब सुनकर कहा – “ऐसा है तो जो लोग जानते हैं वे बाकी लोगों को बता दें कि मैं किस बारे में बात करनेवाला था.” यह कहकर मुल्ला अपने घर चला गया.

खुशबू और खनक
एक दुकान से मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने लिए 2 तथा गधे के लिए 10 नान खरीदे, साथ ही भेड़ का भुना हुआ लज्जतदार गोश्त भी लिया।
दरी में बैठकर नसरुद्दीन खाना खाने लगा। पास ही खड़ा उसका गधा भी नानों पर हाथ साफ करने में जुटा था।
नसरुद्दीन ने उसी स्थान पर रात बिताने की सोच रखी थी। वह खुले में बैठै था तो धनी व्यापारी तथा यात्री तंबू गाड़कर भीतर बैठे मौज कर रहे थे।
तभी नसरुद्दीन के कानों में कुछ तेज-तेज आवाज़ें पड़ी, जैसे कोई झगड़ रहा हो। जिस दुकान से उसने नान तथा गोश्त खरीदा था, वहीं कुछ हलचल सी दिख रही थी।
नसरुद्दीन अपनी उत्सुकता दबा न सका और उसी ओर बढ़ चला।

उसने देखा कि दुकान का मालिक एक गरीब से दिखने वाले आदमी से झगड़ रहा था।
वह कह रहा था, ‘‘तुम्हें पैसे देने ही होंगे। तुम जानबूझ कर उस ओर लेटे थे, जिस ओर मेरी दुकान से गोश्त की खुशबू उठकर जा रही थी। सारी शाम तुम बढ़िया खाने की खुशबू का आनंद लेते रहे। मैंने देखा भी था- तुम बार-बार होंठों पर जीभ फिरा कर चटखारे ले रहे थे। मैं कोई दान-खाता खोलकर नहीं बैठा-जल्दी से पैसे चुकाओ।’’
बेचारा गरीब आदमी बेहद असहाय दिख रहा था। शायद, नसरुद्दीन की तरह उसके पास भी फालतू पैसे नहीं थे।
लालची दुकानदार की बातें सुनकर नसरुद्दीन को गुस्सा आने लगा था।

तभी दुकानदार अचानक नसरुद्दीन की तरफ मुड़ता हुआ बोला, ‘‘भाई साहब, अभी आप एक शरीफ आदमी की तरह मुझसे नान-गोश्त खरीद ले गए थे। लेकिन इस मक्कार को देखो- मुफ्त में स्वाद लेना चाहता है। क्या इसे दाम नहीं चुकाना चाहिए ?’’
नसरुद्दीन उस आदमी से मुखाबित होता बोला, ‘‘भाई, तुमने ललीज खाने की खुशबू का आनंद लिया है, तुम्हें कीमत चुकानी होगी। लाओ, जितने पैसे हैं तुम्हारे पास मुझे दे दो।’’
सुनकर दुकानदार का चेहरा खिल उठा।
गरीब आदमी ने अंटी में से कुछ सिक्के निकालकर नसरुद्दीन की हथेली पर रख दिए।
नसरुद्दीन ने उन सिक्कों को दोनों हथेलियों के बीच रखा और दुकानदार से बोला, ‘‘लाओ, अपना कान इधर लाओ और ध्यान से सुनो।’’
दुकानदार के कुछ समझ में ही नहीं आया।
नसरुद्दीन बोला, ‘‘तुमने सुनी सिक्कों की खनक ?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, लाओ पैसे मुझे दे दो।’’ दुकानदार बोला।
लेकिन नसरुद्दीन ने सिक्के गरीब आदमी को लौटा दिए और दुकानदार से बोला, ‘‘हिसाब बराबर हो गया। इसने तुम्हारे खाने की खुशबू ली और तुमने बदले में सिक्कों की खनक सुन ली।’’
दुकानदार का चेहरा फक्क पड़ गया।
वहां खड़े लोगों ने भी नसरुद्दीन की बात का समर्थन किया।
उस गरीब आदमी ने नसरुद्दीन का शुक्रिया अदा किया।
जब नसरुद्दीन वापस गधे के पास पहुंचा तो वह उसे देख खुशी से मिट्टी में लोटने लगा।

पेशगी थप्पड़

एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ने घर का काम-काज करने के लिए नौकर रखा। उसका मानना था कि तालाब से पानी भरकर लाना उस जैसे इज्जतदार आदमी के लिए अच्छा नहीं।
एक-दो बार ऐसा भी हो चुका था कि पानी लेकर लौटते समय नसरुद्दीन की मुलाकात किसी पहचान वाले से हो जाती। वह आदाब करता तो नसरुद्दीन को भी झुककर जवाब देना पड़ता और नसरुद्दीन के कंधे पर घड़े में रखा सारा पानी सामने वाले पर जा गिरता। किसी से कुछ कहते न बनता था।
उसके नौकर का नाम था अब्दुल।
एक दिन नसरुद्दीन ने उसे मिट्टी का घड़ा देते हुए कहा, ‘‘यह घड़ा लो, तुम्हें रोज 12 घड़े पानी तालाब से भरकर लाना है।’’

अब्दुल ने रजामंदी में सिर हिलाया।
जैसे ही वह जाने को तैयार हुआ कि नसरुद्दीन बोला, ‘‘सुनो ! सावधानी बरतना, घड़ा टूटना नहीं चाहिए।’’
अब्दुल मुड़कर जाने लगा तो नसरुद्दीन फिर बोला, ‘‘चौकस रहना, यदि तुमने घड़ा तोड़ दिया तो थप्पड़ खाना पड़ेगा....याद रखना।’’
अभी अब्दुल दरवाजे तक पहुँचा ही था कि नसरुद्दीन ने चिल्ला कर हाथ से इशारा करते हुए वापस बुलाया।
हैरान-परेशान नौकर वापस नसरुद्दीन के सामने जा खड़ा हुआ।
नसरुद्दीन ने एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया। ‘पटाक्’ की आवाज हुई, अब्दुल के हाथ से घड़ा छूटते-छूटते बचा।

अब्दुल बोला, ‘‘मालिक आपने मुझे मारा क्यों ? मैंने तो घड़ा भी नहीं तोड़ा।’’
नसरुद्दीन बोला, ‘‘देखो भाई, अगर मैं तुम्हें घड़ा टूटने के बाद थप्पड़ मारता तो भी घड़ा जुड़ तो नहीं जाता। जुड़ता क्या ?’’
‘‘नहीं।’’ अब्दुल बोला।
‘‘इसीलिए मैंने तुम्हें पेशगी थप्पड़ मारा है ताकि तुम याद रखो कि घड़ा टूटने पर कैसा थप्पड़ पड़ेगा। तुम भविष्य में चौकस रहोगे।’’
नौकर बेचारा नसरुद्दीन को खुले मुंह ताकता रह गया।
ग़रीब का झोला
एक दिन मुल्ला कहीं जा रहा था कि उसने सड़क पर एक दुखी आदमी को देखा जो ऊपरवाले को अपने खोटे नसीब के लिए कोस रहा था. मुल्ला ने उसके करीब जाकर उससे पूछा – “क्यों भाई, इतने दुखी क्यों हो?”

वह आदमी मुल्ला को अपना फटा-पुराना झोला दिखाते हुए बोला – “इस भरी दुनिया मेरे पास इतना कुछ भी नहीं है जो मेरे इस फटे-पुराने झोले में समा जाये.”

“बहुत बुरी बात है” – मुल्ला बोला और उस आदमी के हाथ से झोला झपटकर सरपट भाग लिया.

अपना एकमात्र माल-असबाब छीन लिए जाने पर वह आदमी रो पड़ा. वह अब पहले से भी ज्यादा दुखी था. अब वह क्या करता! वह अपनी राह चलता रहा.

दूसरी ओर, मुल्ला उसका झोला लेकर भागता हुआ सड़क के एक मोड़ पर आ गया और मोड़ के पीछे उसने वह झोला सड़क के बीचोंबीच रख दिया ताकि उस आदमी को ज़रा दूर चलने पर अपना झोला मिल जाए.

दुखी आदमी ने जब सड़क के मोड़ पर अपना झोला पड़ा पाया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा . वह ख़ुशी से रो पड़ा और उसने झोले को उठाकर अपने सीने से लगा लिया और बोला – “मेरे झोले, मुझे लगा मैंने तुम्हें सदा के लिए खो दिया!”

झाड़ियों में छुपा मुल्ला यह नज़ारा देख रहा था. वह हंसते हुए खुद से बोला – “ये भी किसी को खुश करने का शानदार तरीका है!”

किस्मत सबकी पलटा खाती है. एक वक़्त ऐसा भी आया कि मुल्ला को खाने के लाले पड़ गए. बहुत सोचने के बाद मुल्ला को लगा कि भीख मांगने से अच्छा पेशा और कोई नहीं हो सकता इसलिए वो शहर के चौक पर खड़ा होकर रोज़ भीख मांगने लगा.

मुल्ला के बेहतर दिनों में उससे जलनेवालों ने जब मुल्ला को भीख मांगते देखा तो उसका मजाक उड़ाने के लिए वे उसके सामने एक सोने का और एक चांदी का सिक्का रखते और मुल्ला से उनमें से कोई एक सिक्का चुनने को कहते. मुल्ला हमेशा चांदी का सिक्का लेकर उनको दुआएं देता और वे मुल्ला की खिल्ली उड़ाते.

मुल्ला का एक चाहनेवाला यह देखकर बहुत हैरान भी होता और दुखी भी. उसने एक दिन मौका पाकर मुल्ला से उसके अजीब व्यवहार का कारण पूछा – “मुल्ला, आप जानते हैं कि सोने के एक सिक्के की कीमत चांदी के कई सिक्कों के बराबर है फिर भी आप अहमकों की तरह हर बार चांदी का सिक्का लेकर अपने दुश्मनों को अपने ऊपर हंसने का मौका क्यों देते हैं.”

“मेरे अज़ीज़ दोस्त” – मुल्ला ने कहा – “मैंने तुम्हें सदा ही समझाया है कि चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी वो दिखती हैं. क्या तुम्हें वाकई ये लगता है कि वे लोग मुझे बेवकूफ साबित कर देते हैं? सोचो, अगर एक बार मैंने उनका सोने का सिक्का कबूल कर लिया तो अगली बार वे मुझे चांदी का सिक्का भी नहीं देंगे. हर बार उन्हें अपने ऊपर हंसने का मौका देकर मैंने चांदी के इतने सिक्के जमा कर लिए हैं कि मुझे अब खाने-पीने की फ़िक्र करने की कोई ज़रुरत नहीं है.”

एक दिन मुल्ला के एक दोस्त ने उससे पूछा – “मुल्ला, तुम्हारी उम्र क्या है?”

मुल्ला ने कहा – “पचास साल.”

“लेकिन तीन साल पहले भी तुमने मुझे अपनी उम्र पचास साल बताई थी!” – दोस्त ने हैरत से कहा.

“हाँ” – मुल्ला बोला – “मैं हमेशा अपनी बात पर कायम रहता हूँ”.

“जब मैं रेगिस्तान में था तब मैंने खूंखार लुटेरों की पूरी फौज को भागने पर मजबूर कर दिया था” – मुल्ला ने चायघर में लोगों को बताया.

“वो कैसे मुल्ला!?” – लोगों ने हैरत से पूछा.

“बहुत आसानी से!” – मुल्ला बोला – “मैं उन्हें देखते ही भाग लिया और वे मेरे पीछे दौड़ पड़े!”

एक सुनसान रास्ते में घूमते समय नसरुद्दीन ने घोड़े पर सवार कुछ लोगों को अपनी और आते देखा. मुल्ला का दिमाग चलने लगा. उसने खुद को लुटेरों के कब्जे में महसूस किया जो उसकी जान लेने वाले थे. उसके मन में खुद को बचाने की हलचल मची और वह सरपट भागते हुए सड़क से नीचे उतरकर दीवार फांदकर कब्रिस्तान में घुस गया और एक खुली हुई कब्र में लेट गया.

घुडसवारों ने उसे भागकर ऐसा करते देख लिया. कौतूहलवश वे उसके पीछे लग लिए. असल में घुडसवार लोग तो साधारण व्यापारी थे. उन्होंने मुल्ला को लाश की तरह कब्र में लेटे देखा. flowers

“तुम कब्र में क्यों लेटे हो? हमने तुम्हें भागते देखा. क्या हम तुम्हारी मदद कर सकते हैं? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” – व्यापारियों ने मुल्ला से पूछा.

“तुम लोग सवाल पूछ रहे हो लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि हर सवाल का सीधा जवाब हो” – मुल्ला अब तक सब कुछ समझ चुका था – “सब कुछ देखने के नज़रिए पर निर्भर करता है. मैं यहाँ तुम लोगों के कारण हूँ, और तुम लोग यहाँ मेरे कारण हो”.

मुल्ला एक दिन दूसरे शहर गया और उसने वहां एक दूकान के सामने एक आदमी खड़ा देखा जिसकी दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुई थी. मुल्ला ने उस आदमी से पूछा – “क्यों मियां, तुम दाढ़ी कब बनाते हो?”

उस आदमी ने जवाब दिया – “दिन में 20-25 बार.”

मुल्ला ने कहा – “क्यों बेवकूफ बनाते हो मियां!”

आदमी बोला – “नहीं. मैं नाइ हूँ.”

एक दिन मुल्ला का एक दोस्त उससे एक-दो दिन के लिए मुल्ला का गधा मांगने के लिए आया. मुल्ला अपने दोस्त को बेहतर जानता था और उसे गधा नहीं देना चाहता था. मुल्ला ने अपने दोस्त से यह बहाना बनाया कि उसका गधा कोई और मांगकर ले गया है. ठीक उसी समय घर के पिछवाड़े में बंधा हुआ मुल्ला का गधा रेंकने लगा.

गधे के रेंकने की आवाज़ सुनकर दोस्त ने मुल्ला पर झूठ बोलने की तोहमत लगा दी.

मुल्ला ने दोस्त से कहा – “मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता क्योंकि तुम्हें मेरे से ज्यादा एक गधे के बोलने पर यकीन है.”

एक बार मुल्ला को लगा कि लोग मुफ्त में उससे नसीहतें लेकर चले जाते हैं इसलिए उसने अपने घर के सामने इश्तेहार लगाया: “सवालों के जवाब पाइए. किसी भी तरह के दो सवालों के जवाब सिर्फ 100 दीनार में”

एक आदमी मुल्ला के पास अपनी तकलीफ का हल ढूँढने के लिए आया और उसने मुल्ला के हाथ में 100 दीनार थमाकर पूछा – “दो सवालों के जवाब के लिए 100 दीनार ज्यादा नहीं हैं?”

“नहीं” – मुल्ला ने कहा – “आपका दूसरा सवाल क्या है?”

नसरुद्दीन अपने घर के बाहर रोटियों के टुकड़े बिखेर रहा था.

उसे यह करता देख एक पड़ोसी ने पूछा – “ये क्या कर रहे हो मुल्ला!?”

“शेरों को दूर रखने का यह बेहतरीन तरीका है” – मुल्ला ने कहा.

“लेकिन इस इलाके में तो एक भी शेर नहीं है!” – पड़ोसी ने हैरत से कहा.

मुल्ला बोला – “तरीका वाकई कारगर है, नहीं क्या?”

मुल्ला अपने शागिर्दों के साथ एक रात अपने घर आ रहा था कि उसने देखा एक घर के सामने कुछ चोर खड़े हैं और ताला तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

मुल्ला को लगा कि ऐसे मौके पर कुछ कहना खतरे से खाली न होगा इसलिए वह चुपचाप चलता रहा. मुल्ल्ला के शागिर्दों ने भी यह नज़ारा देखा और उनमें से एक मुल्ला से पूछ बैठा – “वे लोग वहां दरवाजे के सामने क्या कर रहे हैं?

“श्श्श…” – मुल्ला ने कहा – “वे सितार बजा रहे हैं.”

“लेकिन मुझे तो कोई संगीत सुनाई नहीं दे रहा” – शागिर्द बोला.

“वो कल सुबह सुनाई देगा” – मुल्ला ने जवाब दिया.


एक दिन बाज़ार में कुछ गाँव वालों ने मुल्ला को घेर लिया और उससे बोले – “नसरुद्दीन, तुम इतने आलिम और जानकार हो. तुम हम सबको अपना शागिर्द बना लो और हमें सिखाओ कि हमें कैसी ज़िन्दगी जीनी चाहिए और क्या करना चाहिए”.

मुल्ला ने कुछ सोचकर कहा – “ठीक है. सुनो. मैं तुम्हें पहला सबक यहीं दे देता हूँ. सबसे ज़रूरी बात यह है कि हमें अपने पैरों की अच्छी देखभाल करनी चाहिए और हमारी जूतियाँ हमेशा दुरुस्त और साफसुथरी होनी चाहिए”.

लोगों ने मुल्ला की बात बहुत आदरपूर्वक सुनी. फिर उनकी निगाह मुल्ला के पैरों की तरफ गई. मुल्ला के पैर बहुत गंदे थे और उसकी जूतियाँ बेहद फटी हुई थीं.

किसी ने मुल्ला से कहा – “नसरुद्दीन, लेकिन तुम्हारे पैर तो बहुत गंदे हैं और तुम्हारी जूतियाँ भी इतनी फटी हैं कि किसी भी वक़्त पैर से अलग हो जाएँगी. तुम खुद तो अपनी सीख पर अमल नहीं करते हो और हमें सिखा रहे हो कि हमें क्या करना चाहिए!”

“अच्छा!” – मुल्ला ने कहा – “लेकिन मैं तो तुम लोगों की तरह किसी से ज़िन्दगी जीने के सबक सिखाने की फरियाद नहीं करता!”


आधी रात के वक़्त घर के बाहर दो व्यक्तियों के झगड़ने की आवाज़ सुनकर मुल्ला की नींद खुल गई. कुछ वक़्त तक तो मुल्ला इंतज़ार करता रहा कि दोनों का झगड़ा ख़त्म हो जाये और उसे फिर से नींद आ जाये लेकिन झगड़ा जारी रहा.

कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. मुल्ला अपने सर और बदन को कसकर रजाई से लपेटकर घर के बाहर आया. उसने उन दोनों झगड़ा करनेवालों को अलग करने की कोशिश की. वे दोनों तो अब मारपीट पर उतारू हो गए थे.

मुल्ला ने जब उन दोनों को न झगड़ने की समझाइश दी तो उनमें से एक आदमी ने यकायक मुल्ला की रजाई छीन ली और फिर दोनों आदमी भाग गए.

नींद से बोझिल और थका हुआ मुल्ला घर में दाखिल होकर बिस्तर पर धड़ाम से गिर गया. मुल्ला की बीबी ने पूछा – “बाहर झगड़ा क्यों हो रहा था?”

“रजाई के कारण” – मुल्ला ने कहा – “रजाई चली गई और झगडा ख़तम हो गया”.


 एक  दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे पर बैठकर किसी दूसरे शहर से अपने गाँव आया. लोगों ने उसे रोककर कहा – “मुल्ला, तुम अपने गधे पर सामने पीठ करके क्यों बैठे हो?” मुल्ला ने कहा – “मैं यह जानता हूँ कि मैं कहाँ जा रहा हूँ लेकिन मैं यह देखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से आ रहा हूँ.


उसी शाम मुल्ला रसोई में कुछ बना रहा था. वह अपने पड़ोसी के पास गया और उससे एक बरतन माँगा और वादा किया कि अगली सुबह उसे वह बरतन लौटा देगा.

अगले दिन मुल्ला पड़ोसी के घर बरतन लौटाने के लिए गया. पडोसी ने मुल्ला से अपना बरतन ले लिया और देखा कि उसके बरतन के भीतर वैसा ही एक छोटा बरतन रखा हुआ था. पड़ोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! यह छोटा बरतन किसलिए?” मुल्ला ने कहा – “तुम्हारे बरतन ने रात को इस बच्चे बरतन को जन्म दिया इसलिए मैं तुम्हें दोनों वापस कर रहा हूँ.”

पड़ोसी को यह सुनकर बहुत ख़ुशी हुई और उसने वे दोनों बरतन मुल्ला से ले लिए. अगले ही दिन मुल्ला दोबारा पड़ोसी के घर गया और उससे पहलेवाले बरतन से भी बड़ा बरतन माँगा. पडोसी ने ख़ुशी-ख़ुशी उसे बड़ा बरतन दे दिया और अगले दिन का इंतज़ार करने लगा.

एक हफ्ता गुज़र गया लेकिन मुल्ला बरतन वापस करने नहीं आया. मुल्ला और पडोसी बाज़ार में खरीदारी करते टकरा गए. पडोसी ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! मेरा बरतन कहाँ है?” मुल्ला ने कहा – “वो तो मर गया!” पडोसी ने हैरत से पूछा – “ऐसा कैसे हो सकता है? बरतन भी कभी मरते हैं!” मुल्ला बोला – “क्यों भाई, अगर बरतन जन्म दे सकते हैं तो मर क्यों नहीं सकते?”

* * * * *

एक दिन मुल्ला और उसका एक दोस्त कहवाघर में बैठे चाय पी रहे थे और दुनिया और इश्क के बारे में बातें कर रहे थे. दोस्त ने मुल्ला से पूछा – “मुल्ला! तुम्हारी शादी कैसे हुई?”

मुल्ला ने कहा – “यार, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा. मैंने अपनी जवानी सबसे अच्छी औरत की खोज में बिता दी. काहिरा में मैं एक खूबसूरत, और अक्लमंद औरत से मिला जिसकी आँखें जैतून की तरह गहरी थीं लेकिन वह नेकदिल नहीं थी. फिर बग़दाद में भी मैं एक औरत से मिला जो बहुत खुशदिल और सलीकेदार थी लेकिन हम दोनों के शौक बहुत जुदा थे. एक के बाद दूसरी, ऐसी कई औरतों से मैं मिला लेकिन हर किसी में कोई न कोई कमी पाता था. और फिर एक दिन मुझे वह मिली जिसकी मुझे तलाश थी. वह सुन्दर थी, अक्लमंद थी, नेकदिल थी और सलीकेदार भी थी. हम दोनों में बहुत कुछ मिलता था. मैं तो कहूँगा कि वह पूरी कायनात में मेरे लिए ही बनी थी…” दोस्त ने मुल्ला को टोकते हुए कहा – “अच्छा! फिर क्या हुआ!? तुमने उससे शादी कर ली!”

मुल्ला ने ख्यालों में खोए हुए चाय की एक चुस्की ली और कहा – “नहीं दोस्त! वो तो दुनिया के सबसे अच्छे आदमी की तलाश में थी.”

* * * * *







मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा खो गया
1 एक दिन मुल्ला बाज़ार गया और उसने एक इश्तेहार लगाया जिसपर लिखा था : “जिसने भी मेरा गधा चुराया है वो मुझे उसे लौटा दे. मैं उसे वह गधा ईनाम में दे दूंगा”.

“नसरुद्दीन!” – लोगों ने इश्तेहार पढ़कर कहा – “ऐसी बात का क्या मतलब है!? क्या तुम्हारा दिमाग फिर गया है?”

“दुनिया में दो ही तरह के तोहफे सबसे अच्छे होते हैं” – मुल्ला ने कहा – “पहला तो है अपनी खोई हुई सबसे प्यारी चीज़ को वापस पा लेना, और दूसरा है अपनी सबसे प्यारी चीज़ को ही किसी को दे देना.”

2 एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा खो गया | जो उसे बहुत ही प्रिय था । सब जगह दूंढा लेकिन फिर भी मुल्ला के हाथ निराशा ही लगी । गाँव के लोग भी मुल्ला नसीरुद्दीन की मदद के लिए आगे आये और पूरा गाँव खोज डाला गया लेकिन मुल्ला नसीरुद्दीन का गधा कंही नहीं मिला इस पर लोग भी हताश होकर कहने लगे गाँव में तो कंही नहीं है इसका मतलब तीर्थ यात्रा जाने वाले कारवें के साथ कंही निकल गया है सो उसे और खोजना भी व्यर्थ है कहकर वो अपने अपने घरों को चले गये ।

मुल्ला नसीरुद्दीन ने सोचा जब इतना खोज लिया है तो एक आखिरी उपाय और करलूं यह सोचकर वह अपने हाथों और पेरो के बल गधे के जैसे ही खड़ा हो गया और इधर उधर घूमने लगा और अपने घर मकान बगीचे का चक्कर लगा कर वह ठीक उसी गड्ढे के पास पहुँच गया जिसमे उसका प्रिय गधा गिरा हुआ उसे मिल गया ।

गाँव वाले सब हैरान हुए कहने लगे मुल्ला ये कौनसी तरकीब तुमने निकली हद ही हो गयी । तो मुल्ला कहने लगा जब आदमी बन गधे को खोजा तो कंही नही  मिला तो सोचा कि गधे की कुंजी आदमी के पास तो है नहीं सोचकर मैं मन में भावना की मैं गधा हूँ और गधा होता तो कन्हा कन्हा जाता और कंहा दूसरे गधे को तलाश करता और मुझे मेरा गधा इस गड्ढे में पड़ा हुआ मिल गया । मुझे नहीं पता मैं कैसे इस गद्दे के पास आया लेकिन बस ये हो गया ।


मुल्ला और पड़ोसी
एक पड़ोसी मुल्ला नसरुद्दीन के द्वार पर पहुंचा . मुल्ला उससे मिलने बाहर निकले . “ मुल्ला क्या तुम आज के लिए अपना गधा मुझे दे सकते हो , मुझे कुछ सामान दूसरे शहर पहुंचाना है ? ”

मुल्ला उसे अपना गधा नहीं देना चाहते थे , पर साफ़ -साफ़ मन करने से पड़ोसी को ठेस पहुँचती इसलिए उन्होंने झूठ कह दिया , “ मुझे माफ़ करना मैंने तो आज सुबह ही अपना गधा किसी उर को दे दिया है .”

मुल्ला ने अभी अपनी बात पूरी भी नहीं की थी कि अन्दर से ढेंचू-ढेंचू की आवाज़ आने लगी .

“ लेकिन मुल्ला , गधा तो अन्दर बंधा चिल्ला रहा है .”, पड़ोसी ने चौकते हुए कहा .

“ तुम किस पर यकीन करते हो .”, मुल्ला बिना घबराए बोले , “ गधे पर या अपने मुल्ला पर ?”

पडोसी चुपचाप वापस चला गया .


बेवकूफ कौन
मुल्ला की शोहरत इतनी ज्यादा हो चली थी कि आसपास के इलाकों में उनसे जलने वाले भी कम नहीं थे। वह जितना बेहतर करते कुछ लोग उतनी ही जलन रखते। पड़ोसी कस्बे का एक शख्स बहुत जल-भुन कर इस नतीजे  पर पहुंचा कि अब बहुत हो गया, क्यों न मुल्ला के घर ही पहुंचकर उनके इल्म से दो-दो हाथ कर लिए जाएं। मुल्ला को पता लगा कि कोई शख्स उन्हें मात खिलाने को उतावला हो रहा है तो अच्छे मेजबान की तरह उन्होंने पहल की और खुद ही उसे आने का न्योता भेज दिया। वो शख्स मुल्ला से बहस के लिए उनके घर पहुंचा तो उसने दरवाजे पर ताला लगा पाया। मुल्ला को न पाकर वह आग-बबूला हो उठा और कहने लगा - 'मुझे घर बुलाकर खुद गायब हो गया कायर।' जाते-जाते वो उनके दरवाजे पर लिख गया 'बेवकूफ।' जब मुल्ला लौटकर आए तो उन्होंने अपने दरवाजे पर ‘बेवकूफ‘ लिखा देखा और उल्टे पांव उस शख्स के घर रवाना हो गए। वहां पहुंचकर उन्होंने दरवाजा बजाया। दरवाजा खुलते ही मुल्ला ने कहा - ‘जनबा, आप मेरे यहां आए थे बहस के लिए, अफसोस! उस वक्त मैं घर पर नहीं था। दरअसल, मैं बहस की बात ही भूल गया था, लेकिन दरवाजे पर आपके दस्तखत देखते ही मुझे याद आ गया और मैं चला आया।'

यह तो अच्छा हुआ कि.....
सुल्तान से तोहफे में मिली जमीन से मुल्ला खूब फायदा उठाए जा रहे थे। पिछले दफे उन्होंने खजूर लगाए और अच्छी आमद पर टोकरी भरकर सुल्तान को दी। मीठे खजूर खाकर सुल्तान बेहद खुश हुए कि मुल्ला ने जमीन और सुल्तान दोनों का अच्छा ख्याल रखा है। इस बार मुल्ला नसरूद्दीन ने खजूर नहीं तरबूज बोए। फसल अच्छी आई तो उन्होंने सोचा कि क्यों न सुल्तान के यहां बोरा भरकर तरबूज दे आऊं। जब वह बोरा उठाए जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें अपना पुराना हमदर्द दोस्त मिल गया जो कभी-कभार उन्हें नेक सलाह दे दिया करता था। दोस्त ने पूछा ‘कहां जा रहे हो? यह बोरी भरे तरबूज लेकर।'

मुल्ला ने कहा - 'सुल्तान को तोहफे में देने जा रहा हूं।' दोस्त बोला - 'तुम मूर्ख हो! भला सुल्तान इतने सारे तरबूजों का क्या करेगा? फिर तरबूज भी कोई तोहफे में देने की चीज है। अरे तुम तोहफा देना ही चाहते हो तो कोई अच्छी चीज दो। क्यों नहीं लाल फूल दे देते।' मुल्ला ने सोचा दोस्त सही कह रहा है, वाकई, फूल अच्छा तोहफा साबित होंगे? उन्होंने फूलों का गुच्छा तैयार करवाया और लेकर पहुंच गए सुल्तान के दरबार में। यह मुल्ला की बदनसीबी ही थी कि उस वक्त सुल्तान का दिमाग ठीक नहीं था। वह किसी बात से बेगम पर भड़क तो रहे थे पर अपना गुस्सा नहीं उतार पर रहे थे। तभी उनकी नज़र मुल्ला के गुलदस्ते पर पड़ी। और उन्होंने फूल छीनकर उसी के मुंह पर दे मारे। सुल्तान का मिजाज भांपते ही मुल्ला ने अब वहां से चुपचाप खिसकने में ही खैरियत समझी। रास्ते भर अपनी तकदीर का शुक्रिया अदा किए जा रहे मुल्ला सितारों की ओर हाथा उठा-उठाकर कहे जा रहे थे- 'वो तो अच्दा हुआ जो रास्ते में दोस्त मिल गया और उसने तोहफे में फूल देने की सलाह दे डाली। अगर उसकी न मानकर मैं बोरी भरे तरबूज ले जाता तो वह सब मेरे मुंह पर पड़ते, मैं तो मर ही जाता।'



पैर जो जला है
तर्क गढ़ने और बात टालने में मुल्ला का कभी कोई सानी नहीं रहा। अगर उन्हें कोई काम करना है तो वह कैसे भी करेंगे ही और अगर नहीं करना तो फिर बहानों की उन्हें क्या कमी? एक गरीब अनपढ़ उनका उनका वक्त जाया करने आ गया। वह चाहता था मुल्ला उनके लिए एक खत लिखें जो वह अपने भाई के पास भेजने की चाह में था। उसकी फरमाइश सुनकर मुल्ला ने कहा- 'यह तो नामुमकिन है, तुम देख रहे हो मेरा पांव जला हुआ है।' गरीब आदमी को हैरत हुई कि यह क्या बात। उसने मुल्ला के लिए खुदा से खैरियत मांगते हुए पूछा कि - 'जले हुए पैर का भला मेरे खत से क्या ताल्लुक। चिट्ठी तो हाथ से लिखी जाती है। मैं तो तुम्हारा मतलब समझ नहीं पा रहा हूं।' मुल्ला ने कहा- 'मेरे कहे का बहुत बड़ा मतलब है, अगर तुम उसे समझ सको तो समझो।‘ बुखार में सबको पता है कि मेरी लिखावट इतनी खराब है कि मेरा लिखा सिर्फ मैं ही समझ पाता हूं और कोई नहीं। अगर मैं तुम्हारे भाई को खत लिखूंगा तो वह पढ़ नहीं पाएगा। खत में क्या लिखा है यह पढ़कर सुनाने मुझे उसके गांव जाना पड़ेगा और तुम तो देख ही रहे हो पैर जलने से मैं कहीं भी जाने से लाचार हूं। इसलिए तुम किसी और को ढूंढ़कर उससे खत लिखा लो।'


मुल्ला नसरुद्दीन के अजीबो गरीब प्रयोग

युद्ध के समय सेना में जबरदस्ती लोगों को भर्ती किया जा रहा था। उन्हीं लोगों में मुल्ला नसरुद्दीन को भी पकड़ लाया गया था। मुल्ला को सभी परीक्षणों से गुजारा गया और उसने सभी परीक्षणों से बचने की कोशिश की। गलत—सही जवाब दिए, उलटे—सीधे उत्तर लिखे, मगर फिर भी उसे खरा साबित कर दिया गया। उन्हें तो भर्ती करना ही था। मुल्ला परेशान था, क्योंकि वह सेना में भर्ती नहीं होना चाहता था। अंतिम परीक्षण नेत्र—परीक्षण था। मुल्ला को एक बड़े बोर्ड के समक्ष ले जाया गया, जिस पर वर्णमाला के अनेक अक्षर, अनेक चिह्न, अनेक प्रकार के निशान बने हुए थे।

अच्छा यह तो बताओ जरा नसरुद्दीन कि यह कौन सा अक्षर है? चुनाव अधिकारी ने एक अक्षर की ओर इशारा करते हुए नसरुद्दीन से पूछा। मुल्ला ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा महोदय, मुझे कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा कि वह क्या है। अधिकारी ने पूछा कि तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है अक्षर? मुल्ला ने कहा अक्षर! मुझे बोर्ड नहीं दिखाई पड़ रहा। अधिकारी ने बड़े बोर्ड बुलवाए। बड़े—बड़े अक्षरों वाले बोर्ड। मगर वह हमेशा यही कहे, मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा— कहां बोर्ड है? कहां अक्षर है?

हार कर अधिकारियों ने… कुछ सूझा नहीं तो अंततः एक थाली बुलवाई और चिढ़ कर मुल्ला से पूछा, नसरुद्दीन! हाथ में रखो, देखो इसको, अब तो बता दो कि यह क्या है? या कि इसे भी नहीं पहचानते? नसरुद्दीन ने गौर से देखा थाली को और कहा : अरे, यह मेरी अठन्नी कहां मिली आपको! इसे मैं तीन दिन से खोज रहा हूं।

सिर ठोक लिया अधिकारियों ने— कहा, ठीक है। छुट्टी पाई वहां से। नसरुद्दीन बाहर निकला प्रसन्नता में, पास ही जाकर एक मेटिनी शो में बैठ गया। जब इंटरवल हुआ और प्रकाश हुआ तो वह देख कर चकित हुआ कि बगल में वही अधिकारी बैठा हुआ है। उसके तो प्राण निकल गए! इसके पहले कि अधिकारी कुछ कहे— कि तुम्हें थाली अठन्नी दिखाई पड़ती थी और इतने दूर बैठ कर तुम्हें फिल्म मजे से दिखाई पड़ रही है; और बोर्ड तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता था, अक्षर की तो बात ही क्या थी— इसके पहले कि अधिकारी कुछ कहे, अधिकारी कहने ही कहने को था कि नसरुद्दीन ने कहा कि महोदय, यह बस कहां जा रही है?


मुल्ला बने कम्युनिस्ट

एक बार खबर फैली की मुल्ला नसरुदीन कम्युनिस्ट बन गए हैं . जो भी सुनता उसे आश्चर्य होता क्योंकि सभी जानते थे की मुल्ला अपनी चीजों को लेकर कितने पोजेसिव हैं .

जब उनके परम मित्र ने ये खबर सुनी तो वो तुरंत मुल्ला के पास पहुंचा .

मित्र : “ मुल्ला क्या तुम जानते हो कम्युनिज्म का मतलब क्या है ?”
मुल्ला : “हाँ , मुझे पता है .”

मित्र : “ क्या तुम्हे पता है अगर तुम्हारे पास दो कार है और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपनी एक कार देनी पड़ेगी ”
मुल्ला : “ हाँ , और मैं अपनी इच्छा से देने के लिए तैयार हूँ .”

मित्र : “ अगर तुम्हारे पास दो बंगले हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक बंगला देना होगा ?”
मुल्ला : “ हाँ , और मैं पूरी तरह से देने को तैयार हूँ .”

मित्र :” और तुम जानते हो अगर तुम्हारे पास दो गधे हैं और किसी के पास एक भी नहीं तो तुम्हे अपना एक गधा देना पड़ेगा ?”
मुल्ला : “ नहीं , मैं इस बात से मतलब नहीं रखता , मैं नहीं दे सकता , मैं बिलकुल भी ऐसा नहीं कर सकता .”

मित्र : “ पर क्यों , यहाँ भी तो वही तर्क लागू होता है ?”
मुल्ला : “ क्योंकि मेरे पास कार और बंगले तो नहीं हैं , पर दो गधे ज़रूर हैं .”


मुल्ला का प्रवचन

एक बार मुल्ला नसरुदीन को प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया गया . मुल्ला समय से पहुंचे और स्टेज पर चढ़ गए , “ क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ? मुल्ला ने पूछा .

“नहीं ” बैठे हुए लोगों ने जवाब दिया .

यह सुन मुल्ला नाराज़ हो गए ,” जिन लोगों को ये भी नहीं पता कि मैं क्या बोलने वाला हूँ मेरी उनके सामने बोलने की कोई इच्छा नहीं है . “ और ऐसा कह कर वो चले गए .

उपस्थित लोगों को थोड़ी शर्मिंदगी हुई और उन्होंने अगले दिन फिर से मुल्ला नसरुदीन को बुलावा भेज .

इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न दोहराया , “ क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?”

“हाँ ”, कोरस में उत्तर आया .

“बहुत अच्छे जब आप पहले से ही जानते हैं तो भला दुबारा बता कर मैं आपका समय क्यों बर्वाद करूँ ”, और ऐसा खेते हुए मुल्ला वहां से निकल गए .

अब लोग थोडा क्रोधित हो उठे , और उन्होंने एक बार फिर मुल्ला को आमंत्रित किया .

इस बार भी मुल्ला ने वही प्रश्न किया , “क्या आप जानते हैं मैं क्या बताने वाला हूँ ?”

इस बार सभी ने पहले से योजना बना रखी थी इसलिए आधे लोगों ने “हाँ ” और आधे लोगों ने “ना ” में उत्तर दिया .

“ ठीक है जो आधे लोग जानते हैं कि मैं क्या बताने वाला हूँ वो बाकी के आधे लोगों को बता दें .”

फिर कभी किसी ने मुल्ला को नहीं बुलाया !

फूल थे बादल भी था

ख़्वाहिशें हैं घर से बाहर दूर जाने की बहुत शौक़ 

लेकिन दिल में वापस लौट कर आने का था 




फूल थे बादल भी था, और वो हसीं सूरत भी थी
दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी

जो हवा में घर बनाया काश कोई देखता
दस्त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी

कह गया मैं सामने उसके जो दिल का मुद्दआ
कुछ तो मौसम भी अजब था, कुछ मेरी हिम्मत भी थी

अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई
गो ज़रा से फासले पर घर की हर राहत भी थी

क्या क़यामत है 'मुनीर' अब याद भी आते नहीं
वो पुराने आशना जिनसे हमें उल्फत भी थी



~मुनीर नियाज़ी

हिंदी दिवस

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था. तब से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था
१४ सितम्बर १९४९ को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष १९५३ से पूरे भारत में १४ सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।वर्ष  १९१८ में गांधी जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। स्वतंत्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितम्बर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग १७ के अध्याय की धारा ३४३(१) में इस प्रकार वर्णित है:

संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।