वो ज़िन्दगी ही क्या

वो ज़िन्दगी ही क्या



लफ़्ज़ों की तकरार से, दिलों के तार नहीं टूटते, 
सच्चे हमसफ़र कभी, बीच भँवर में नहीं छूटते। 
तू मेरी कमियों का पर्दा, मैं तेरी ताक़त का गुरूर हूँ, 
जहाँ रूहें बँधी हों, वहाँ ऐतबार नहीं टूटते।

कुछ रूठना, कुछ मनाना, यही तो प्यार की निशानी है, 
तेरे बिना अधूरी सी मेरी हर एक कहानी है। 
आओ भूलें गिले-शिकवे, चलो फिर से मुस्कुराते हैं, 
एक-दूजे का हाथ थाम, इस सफर को और खूबसूरत बनाते हैं।

हुई होंगी खताएँ मुझसे भी, पर और कितना ये हिसाब लगाओगे?
कल भी विकल था मन तुम्हारा, आज भी ये बेचैनी कहाँ छुपाओगे?
क्या वाक़ई मेरी यादों को मिटाकर, ज़िन्दगी में फिर मुस्कुरा पाओगे?

मेरे तो हर साँस का वजूद, सिर्फ तुम्हारी धड़कन से मुकम्मल है,
तुम्हारी रूह भी सिसकती है, दरमियाँ आई इन फासलों की बंदिशों में,
और मेरा तो वजूद ही मिट जाएगा, तुम्हारे बिना ऐ हमसफ़र।

अगर जीना ही ज़िन्दगी है, तो रोज़ ये दिल क्यों मरता है?
तेरे बिना ये वजूद भी, खुद अपने ही साये से डरता है।
उम्र काटने को तो कट ही जाएगी ये तेरे बगैर भी,
पर वो ज़िन्दगी ही क्या, तुम्हारे बिना ऐ हमसफ़र।

थम सी जाती है ये उम्र, वक़्त का दरिया भी ठहर जाता है,
हर ख्वाहिश सच है, जो तेरा साथ है।
साँसें तो बस उम्र गुज़ारने का एक धंधा है,
हर धड़कन में हमसफ़र का साथ ही ज़िन्दगी है।


सही और ग़लत की उलझन में, अक्सर अपने छूट जाते हैं, '
मैं' को साबित करने की ज़िद में, नाज़ुक धागे टूट जाते हैं। 
तज कर अपने अहम को चलो, इस पावन नेह को हम जीत लें, 
ज़िद की हार में छुपी है जो, उस मधुर प्रीत को हम जीत लें।


टिप्पणियाँ