श्याम की रज़ा
“श्याम की रज़ा” तेरे इश्क़ में खोकर ही, खुद को पाया मैंने, तेरे नाम से हर धड़कन को सजाया मैंने। मैं ढूँढता रहा तुझको, दर–दर की गलियों में, दिल के ही मंदिर में तुझको पाया मैंने। मेरी अना की दीवारें, तेरे नूर से ढह गईं, जब झुका शीश, तब ही तुझको पाया मैंने। ना जन्नत की ख्वाहिश, ना दुनिया की आरज़ू, तेरी रज़ा में ही सारा जहाँ पाया मैंने। अब न पूछ “मैं” और “तू” की दूरी क्या, तेरे इश्क़ में मिटकर ही सब कुछ पाया मैंने।