जहाँ श्याम मुस्काए

हवा ने आज मुझसे तेरा पता पूछा है, कह दिया—हर साँस में तू ही तो बसा है। सूरज भी तेरे दर पर झुककर उजाला माँगे, किरण–किरण में तेरा ही नाम लिखा है। नदी ठहर कर बोली—“मैं तुझ तक जाती हूँ”, हर लहर ने कहा—तेरा रास्ता है। पत्तों ने सरसराकर तेरा ज़िक्र किया, हर दरख़्त में तेरा ही साया है। मेरी अना पिघलकर ओस बन गई, तेरे नूर से ही हर ज़ख़्म भरा है। अब न पूछ कहाँ है मेरा ठिकाना, जहाँ श्याम मुस्काए—वहीं मेरा जहाँ है।