खिसक गयी है धूप


पैताने से धीरे-धीरे
खिसक गयी है धूप।
सिरहाने रखे हैं
पीले गुलाब।

क्या नहीं तुम्हें भी
दिखा इनका जोड़-
दर्द तुम में भी उभरा?


सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"








विश्वेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,लंबोदराय सकलाय जगध्दिताय।
नागाननाय श्रुतियग्यविभुसिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

Comments

pawan dhiman said…
your painstaking effort is appreciable. Pl. keep it up.

Popular posts from this blog

हिन्दी की किताबे | Read hindi stories online

चेतक की वीरता | chetak ki veerata

जयशंकर प्रसाद: जीवन परिचय