आने वाली सुबह

आने वाली सुबह

 



आने वाली सुबह  

शायद सिर्फ़ नई रोशनी नहीं होगी,  

शायद किसी पुरानी थकान का  

धीरे‑धीरे उतरता हुआ बोझ होगी।  


रात भर जागती जो चिंताएँ थीं,  

उनकी पलकों पर जब ओस जमेगी,  

तो पहली किरण  

धीरे से उनका माथा चूम कर पूछेगी—  

अब चलें?  


खिड़की की सलाख़ों से  

रेंगती हुई जो हल्की‑सी धूप आएगी,  

वो याद दिलाएगी कि  

बीता हुआ दिन फैसला नहीं,  

बस एक ड्राफ़्ट था  

जिसे आज फिर से सुधारा जा सकता है।  


आने वाली हर सुबह  

किनारे पर लौटती उस लहर जैसी है,  

जो हर बार नई कहानियाँ लेकर आती है,  

भले ही  

कल की रेत पर लिखी इबारतें  

समंदर ने मिटा दी हों।  


तो जब भी अगली सुबह  

तुम्हारे दरवाज़े पर हल्के‑हल्के दस्तक दे,  

ज़रा मुस्कुरा कर कहना—  

ठहर, मैं भी  

थोड़ा‑सा नया हो कर आता हूँ।


-KS

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