उधो मनकी मनमें रही

उधो मनकी मनमें रही ॥ध्रु०॥
गोकुलते जब मथुरा पधारे कुंजन आग देही ॥१॥
पतित अक्रूर कहासे आये दुखमें दाग देही ॥२॥
तन तालाभरना रही उधो जल बल भस्म भई ॥३॥
हमरी आख्या भर भर आवे उलटी गंगा बही ॥४॥
सूरदास प्रभु तुमारे मिलन जो कछु भई सो भई ॥५॥

प्रेमचंद की कहानियाँ: वरदान


विन्घ्याचल पर्वत मध्यरात्रि के निविड़ अन्धकार में काल देव की भांति खड़ा था। उस पर उगे हुए छोटे-छोटे वृक्ष इस प्रकार दष्टिगोचर होते थे, मानो ये उसकी जटाएं है और अष्टभुजा देवी का मन्दिर जिसके कलश पर श्वेत पताकाएं वायु की मन्द-मन्द तरंगों में लहरा रही थीं, उस देव का मस्तक है मंदिर में एक झिलमिलाता हुआ दीपक था, जिसे देखकर किसी धुंधले तारे का मान हो जाता था।

अर्धरात्रि व्यतीत हो चुकी थी। चारों और भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। गंगाजी की काली तरंगें पर्वत के नीचे सुखद प्रवाह से बह रही थीं। उनके बहाव से एक मनोरंजक राग की ध्वनि निकल रही थी। ठौर-ठौर नावों पर और किनारों के आस-पास मल्लाहों के चूल्हों की आंच दिखायी देती थी। ऐसे समय में एक श्वेत वस्त्रधारिणी स्त्री अष्टभुजा देवी के सम्मुख हाथ बांधे बैठी हुई थी। उसका प्रौढ़ मुखमण्डल पीला था और भावों से कुलीनता प्रकट होती थी। उसने देर तक सिर झुकाये रहने के पश्चात कहा।

‘माता! आज बीस वर्ष से कोई मंगलवार ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणो पर सिर न झुकाया हो। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जबकि मैंने तुम्हारे चरणों का ध्यान न किया हो। तुम जगतारिणी महारानी हो। तुम्हारी इतनी सेवा करने पर भी मेरे मन की अभिलाषा पूरी न हुई। मैं तुम्हें छोड़कर कहां जाऊ?’

‘माता! मैंने सैकड़ों व्रत रखे, देवताओं की उपासनाएं की’, तीर्थयाञाएं की, परन्तु मनोरथ पूरा न हुआ। तब तुम्हारी शरण आयी। अब तुम्हें छोड़कर कहां जाऊं? तुमने सदा अपने भक्तो की इच्छाएं पूरी की है। क्या मैं तुम्हारे दरबार से निराश हो जाऊं?’

सुवामा इसी प्रकार देर तक विनती करती रही। अकस्मात उसके चित्त पर अचेत करने वाले अनुराग का आक्रमण हुआ। उसकी आंखें बन्द हो गयीं और कान में ध्वनि आयी।

‘सुवामा! मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूं। मांग, क्या मांगती है?

सुवामा रोमांचित हो गयी। उसका हृदय धड़कने लगा। आज बीस वर्ष के पश्चात महारानी ने उसे दर्शन दिये। वह कांपती हुई बोली ‘जो कुछ मांगूंगी, वह महारानी देंगी’ ?

‘हां, मिलेगा।’

‘मैंने बड़ी तपस्या की है अतएव बड़ा भारी वरदान मांगूगी।’

‘क्या लेगी कुबेर का धन’?

‘नहीं।’

‘इन्द का बल।’

‘नहीं।’

‘सरस्वती की विद्या?’

‘नहीं।’

‘फिर क्या लेगी?’

‘संसार का सबसे उत्तम पदार्थ।’

‘वह क्या है?’

‘सपूत बेटा।’

‘जो कुल का नाम रोशन करे?’

‘नहीं।’

‘जो माता-पिता की सेवा करे?’

‘नहीं।’

‘जो विद्वान और बलवान हो?’

‘नहीं।’

‘फिर सपूत बेटा किसे कहते हैं?’

जो अपने देश का उपकार करे।

‘तेरी बुद्वि को धन्य है। जा, तेरी इच्छा पूरी होगी।’

भारतीय रेल


एक बार हमें करनी पड़ी रेल की यात्रा
देख सवारियों की मात्रा
पसीने लगे छूटने
हम घर की तरफ़ लगे फूटने
 
इतने में एक कुली आया
और हमसे फ़रमाया
साहब अंदर जाना है?
हमने कहा हां भाई जाना है….
उसने कहा अंदर तो पंहुचा दूंगा
पर रुपये पूरे पचास लूंगा
हमने कहा समान नहीं केवल हम हैं
तो उसने कहा क्या आप किसी सामान से कम हैं ?….
 
जैसे तैसे डिब्बे के अंदर पहुचें
यहां का दृश्य तो ओर भी घमासान था
पूरा का पूरा डिब्बा अपने आप में एक हिंदुस्तान था
कोई सीट पर बैठा था, कोई खड़ा था
जिसे खड़े होने की भी जगह नही मिली वो सीट के नीचे पड़ा था….
 
इतने में एक बोरा उछालकर आया ओर गंजे के सर से टकराया
गंजा चिल्लाया यह किसका बोरा है ?
बाजू वाला बोला इसमें तो बारह साल का छोरा है…..
 
तभी कुछ आवाज़ हुई और
इतने मैं एक बोला चली चली
दूसरा बोला या अली …
हमने कहा काहे की अली काहे की बलि
ट्रेन तो बगल वाली चली..

~ हुल्लड मुरादाबादी

लोकविज्ञान- समकालीन रचनाएँ

शीर्षक : लोकविज्ञान- समकालीन रचनाएँ 
लेखक : कृष्ण कुमार मिश्र
प्रथम संस्करण : मार्च 2006
मूल्य : 50 रू.  पृष्ठ संख्या  :  152
प्रकाशक : होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केन्द्र

सोर्स: http://ehindi.hbcse.tifr.res.in/

विज्ञान - इतिहास के आईने में

ई-शब्दावली

शब्दावली या शब्दकोष का किसी भी भाषा के सीखने समझने में बड़ा योगदान रहा है. आज इस पोस्ट में कुछ ऐसेही शब्दकोष का जिक्र किया गया है

https://hi.wiktionary.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%80:%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B6

English-Hindi Glossary
रसायन वि‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह
जीव विज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह




डाउनलोड हिन्दी फोन्ट

डाउनलोड यूनिकोड हिन्दी फोन्ट

माईक्रोसॉफ्ट भाषा इण्डिया

फॉण्ट परिवर्तक

वेबदुनिया का 'डेटा कनवर्टर - यहाँ सैकड़ों फॉन्ट से यूनिकोड में बदलने की आनलाइन सुविधा है

सम्पूर्ण फाइल (.txt) के फोण्ट को यूनिकोड फोण्ट में बदलने हेतु

ओपन आफिस में हिन्दी वर्तनी जाँचक (Spell Check) संस्थापित करने हेतु मार्गदर्शन

हिन्दी साहित्य का इतिहास - 03

हिन्दी साहित्य का इतिहास - 02

हिन्दी साहित्य का इतिहास

७५० ईसा पूर्व - संस्कृत का वैदिक संस्कृत के बाद का क्रमबद्ध विकास।
५०० ईसा पूर्व - बौद्ध तथा जैन की भाषा प्राकृत का विकास (पूर्वी भारत)।
४०० ईसा पूर्व - पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण लिखा (पश्चिमी भारत)। वैदिक संस्कृत से पाणिनि की काव्य संस्कृत का मानकीकरण।
संस्कृत का उद्गम

३२२ ईसा पूर्व - मौर्यों द्वारा ब्राह्मी लिपि का विकास।
२५० ईसा पूर्व - आदि संस्कृत का विकास। (आदि संस्कृत ने धीरे धीरे १०० ईसा पूर्व तक प्राकति का स्थान लिया।)
३२० ए. डी. (ईसवी)- गुप्त या सिद्ध मात्रिका लिपि का विकास।
अपभ्रंश तथा आदि-हिन्दी का विकास

४०० - कालीदास ने "विक्रमोर्वशीयम्" अपभ्रंश में लिखी।
५५० - वल्लभी के दर्शन में अपभ्रंश का प्रयोग।
७६९ - सिद्ध सरहपद (जिन्हें हिन्दी का पहला कवि मानते हैं) ने "दोहाकोश" लिखी।
७७९ - उदयोतन सुरी कि "कुवलयमल" में अपभ्रंश का प्रयोग।
८०० - संस्कृत में बहुत सी रचनायें लिखी गईं।
९९३ - देवसेन की "शवकचर" (शायद हिन्दी की पहली पुस्तक)।
११०० - आधुनिक देवनागरी लिपि का प्रथम स्वरूप।
११४५-१२२९ - हेमचंद्राचार्य ने अपभ्रंश-व्याकरण की रचना की।
अपभ्रंश का अस्त तथा आधुनिक हिन्दी का विकास

१२८३ - अमीर ख़ुसरो की पहेली तथा मुकरियाँ में "हिन्दवी" शव्द का सर्वप्रथम उपयोग।
१३७० - "हंसवाली" की आसहात ने प्रेम कथाओं की शुरुआत की।
१३९८-१५१८ - कबीर की रचनाओं ने निर्गुण भक्ति की नींव रखी।
१४००-१४७९ - अपभ्रंश के आखरी महान कवि रघु।
१४५० - रामानन्द के साथ "सगुण भक्ति" की शुरुआत।
१५८० - शुरुआती दक्खिनी का कार्य "कालमितुल हकायत्" -- बुर्हनुद्दिन जनम द्वारा।
१५८५ - नवलदास ने "भक्तमाल" लिखी।
१६०१ - बनारसीदास ने हिन्दी की पहली आत्मकथा "अर्ध कथानक" लिखी।
१६०४ - गुरु अर्जुन देव ने कई कवियों की रचनाओं का संकलन "आदि ग्रन्थ" निकाला।
१५३२-१६२३ - गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरित मानस" की रचना की।
१६२३ - जाटमल ने "गोरा बादल की कथा" (खडी बोली की पहली रचना) लिखी।
१६४३ - आचार्य केशव दास ने "रीति" के द्वारा काव्य की शुरुआत की।
१६४५ - उर्दू का आरंभ
आधुनिक हिन्दी

१७९६ - देवनागरी रचनाओं की शुरुआती छ्पाई।
१८२६ - "उदन्त मार्तण्ड" हिन्दी का पहला साप्ताहिक।
१८३७ - ओम् जय जगदीश के रचयिता श्रद्धाराम फुल्लौरी का जन्म।
१८७७ - अयोध्या प्रसाद खत्री का हिन्दी व्याकरण, (बिहार बन्धु प्रेस)
१८९३ - काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना
१ मई १९१० - नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
१९५० - हिन्दी भारत की राजभाषा के रुप में स्थापित।
१०-१४ जनवरी १९७५ - नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित
दिसम्बर, १९९३ - मॉरीशस में चतुर्थ विश्व हिन्दी सम्मेलन तथा उसके बाद विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना
१९९७ - वर्धा में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना का अधिनियम संसद द्वारा पारित
२००० - आधुनिक हिंदी का अंतर्राष्ट्रीय विकास
सन्दर्भ

हिन्दी - उद्भव, विकास और स्वरूप; अष्टम संस्करण, १९८४, पृष्त १५