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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जित देखो उत रामहिँ रामा: एक आध्यात्मिक विश्वदर्शन

 जित देखो उत रामहिँ रामा जित देखो उत पूरण कामा तृण तरुवर साते सागर जिते देखो उत मोहन नागर जल थल काष्ठ पषाण अकाशा चंद्र सुरज नच तेज प्रकाशा मोरे मन मानस राम भजो रे 'रामदास' प्रभु ऐसा करो रे

"कहाँ कहाँ जाऊँ तेरे साथ कन्हैया": मीराबाई का अमर भक्ति गीत

  कहाँ कहाँ जाऊँ तेरे साथ कन्हैया बिन्द्रावन की कुंज गलिन में गहे मिलों मेरो हाथ दूध मेरो खायो मटकिया फोरी लीनो भुज भर साथ लपट झपट मोरी गागर पटकी साँवरे सलोने लोने गात कबहूँ न दान लियो मन-मोहन सदा गोकुल आत जात 'मीराँ के प्रभू गिरिधर नागर जनम जनम के नाथ "कहाँ कहाँ जाऊँ तेरे साथ कन्हैया" मीराबाई द्वारा रचित एक प्रसिद्ध भक्ति गीत है, जिसमें कृष्ण के प्रति उनके अगाध प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति है। इस पद में मीरा अपने आराध्य कृष्ण के साथ अपने अनुभवों और भावनात्मक संबंध को व्यक्त करती हैं। पद का अर्थ और व्याख्या यह पद मीराबाई के हृदय में बसे कृष्ण-प्रेम की गहराई को दर्शाता है। आइए इसकी पंक्तियों को समझें: "कहाँ कहाँ जाऊँ तेरे साथ कन्हैया" मीरा कृष्ण से पूछती हैं कि वे उनके साथ कहाँ-कहाँ जाएँ। यह प्रश्न उनकी अनन्य भक्ति और समर्पण को दर्शाता है, जहाँ वे अपने जीवन के हर क्षण में कृष्ण के साथ रहना चाहती हैं। "बिन्द्रावन की कुंज गलिन में गहे मिलों मेरो हाथ" मीरा वृंदावन की कुंज गलियों (पेड़ों और लताओं से घिरे संकरे मार्ग) में कृष्ण के साथ विहार करना चाहती हैं, ...

भारत कोकिला: सरोजिनी नायडू

  उनके महापरिनिर्वाण दिवस (2 मार्च, 1949) पर, हम सरोजिनी नायडू के अद्वितीय योगदान को याद करते हैं - एक स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री, और भारत के प्रदेश     उत्तर प्रदेश   की पहली महिला राज्यपाल। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा 13 फरवरी, 1879 को हैदराबाद में एक बंगाली परिवार में जन्मी, सरोजिनी नायडू ने बचपन से ही असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। उनके पिता, डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, एक वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे, जबकि उनकी माता बारदा सुंदरी देवी एक कवयित्री थीं। इस समृद्ध बौद्धिक वातावरण ने सरोजिनी की प्रतिभा को पोषित किया। अपनी असाधारण प्रतिभा के कारण, मात्र बारह वर्ष की आयु में सरोजिनी ने मैट्रिक की परीक्षा पास कर मद्रास प्रेसीडेंसी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस उपलब्धि से प्रभावित होकर, हैदराबाद के निज़ाम ने उन्हें विदेश में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की। उन्होंने किंग्स कॉलेज लंदन और बाद में गिर्टन कॉलेज, कैम्ब्रिज में अध्ययन किया, जहां उन्होंने अपने साहित्यिक कौशल को निखारा। यह उल्लेखनीय है कि केवल 13 वर्ष की आयु में, सरोजिनी ने 1300 पदों की 'झील की रानी' नामक ...

कल्पना चावला: तारों से आगे, सपनों के पार

परिचय कल्पना चावला (17 मार्च, 1962 - 1 फरवरी, 2003) एक भारतीय-अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और इंजीनियर थीं, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प से न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं। वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं, जिन्होंने अपने जीवन से यह साबित कर दिया कि आकाश भी सीमा नहीं है। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च, 1962 को हरियाणा के करनाल शहर में हुआ था। बचपन से ही उनका मन आकाश में उड़ते हुए विमानों को देखकर रोमांचित हो उठता था। उनके पिता बनारसी लाल चावला एक व्यापारी थे, जबकि मां सांवली देवी गृहिणी थीं। अपने छोटे से शहर से उड़ान भरने के लिए कल्पना ने कड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई की। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल, करनाल से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ से 1982 में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए वह अमेरिका चली गईं और टेक्सास विश्वविद्यालय से 1984 में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री हासिल की...