मन की ऐसी मूर्खता
गदाधर भट्ट | झूलत नागरि नागर लाल।
आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन
आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन आंखडली मां तमने राखूँ रे हरि जे रे जोइये ते तमने आनी आनी आपुं मीठाइ मेव: तमने खावा रे ऊँची ऊँची मेडी साहेबा अजब झरूखा झरूखे चढी चढी झांखुं रे चुन चुन कलियाँ वाली सेज बीछावुं भमर पलंग पर सुखवारी नांखुं रे 'मीराँ बाई के प्रभू गिरिधर निर्गुन तारा चरण कमल पें मन राखूँ रे |
आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन – मीरां बाई के भक्ति गीत की अद्भुत गूंज
मीरां बाई, भक्ति के अमूल्य रत्नों में से एक, जिन्हें भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य श्रद्धा और प्रेम के लिए जाना जाता है, उनका यह भक्ति गीत – "आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन" – एक गहरी भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस गीत में मीरां बाई ने अपने मन की गहरी भावनाओं और भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपनी दीवानगी को व्यक्त किया है। आइए, इस गीत के माध्यम से हम मीरां बाई के अद्वितीय भक्ति भाव की यात्रा पर चलें।
गीत की पंक्तियाँ और उनका अर्थ:
1. आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन
मीरां बाई श्री कृष्ण को अपने मीठे मोहन (कृष्ण) के रूप में पुकारती हैं। "सलोना" शब्द का अर्थ है सुंदर और आकर्षक। मीरां के मन में भगवान की छवि इतनी प्रिय और आकर्षक है कि वह उन्हें अपने जीवन के सबसे प्यारे और सुंदर स्वरूप के रूप में देखती हैं। इस पंक्ति में वे कृष्ण से अपने पास आने का आग्रह कर रही हैं।
2. आंखडली मां तमने राखूँ रे
यह पंक्ति भावनाओं की गहराई को व्यक्त करती है। "आंखडली" का अर्थ है आंखों में बसा लेना, अर्थात् मीरां बाई भगवान श्री कृष्ण को अपने दिल और आंखों में बसाए हुए हैं। उनके लिए कृष्ण का ध्यान और भक्ति ही जीवन का उद्देश्य बन चुका है।
3. हरि जे रे जोइये ते तमने आनी आनी आपुं
यह पंक्ति मीरां बाई के आत्मसमर्पण और आस्था को दर्शाती है। वह भगवान श्री कृष्ण को हर स्थान और हर रूप में देखती हैं। "जोइये ते तमने" का अर्थ है जहां भी भगवान को देखा, वहीं उन्हें अपना पाया। मीरां बाई का यह अनुभव उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणादायक है जो ईश्वर के हर रूप में उसकी उपस्थिति महसूस करते हैं।
4. मीठाइ मेव: तमने खावा रे
मीरां बाई अपने भगवान को उन मीठे स्वादों के रूप में महसूस करती हैं, जैसे कि मिठाइयाँ और मेवे। उनका प्रेम इतना गहरा है कि वह हर स्वाद और हर अनुभव में भगवान की उपस्थिति महसूस करती हैं। इस पंक्ति में भक्ति की मिठास और आनंद का दर्शन होता है।
5. ऊँची ऊँची मेड़ी साहेबा अजब झरूखा
"मेड़ी साहेबा" का अर्थ है उनका भगवान, जो सर्वोच्च और सर्वोत्तम है। मीरां बाई कह रही हैं कि उनके प्रभु श्री कृष्ण के लिए आकाश से ऊँची मेड़ी और अजीब झरूखा बनाना कोई बड़ी बात नहीं है। यह पंक्ति भक्ति के उस उत्तम स्तर को दर्शाती है, जहां भक्त अपने प्रभु को सर्वोच्च मानता है और उनका हर रूप आदर और प्रेम से भरा होता है।
6. झरूखे चढ़ी चढ़ी झांखुं रे
यह पंक्ति मीरां बाई के प्रेम में अभिव्यक्त होने वाली एक सजीव छवि को प्रस्तुत करती है। वह झरूखे (झरोखा) पर चढ़कर भगवान की झलक पाने की इच्छा रखती हैं। उनका हर कदम प्रभु के दर्शन की ओर बढ़ता है, और उनका प्रेम हर क्षण और हर कदम में प्रकट होता है।
7. चुन चुन कलियाँ वाली सेज बीछावुं
यह पंक्ति उस भक्ति को दर्शाती है जहां मीरां बाई अपने प्रभु के लिए सब कुछ समर्पित करती हैं। वह चुनी हुई कलियों से बिस्तर सजाती हैं, अर्थात् भगवान के लिए दुनिया की सबसे सुंदर और प्यारी चीज़ों को प्रस्तुत करती हैं। यह समर्पण और प्रेम का अद्वितीय उदाहरण है।
8. भमर पलंग पर सुखवारी नांखुं रे
यह पंक्ति भी मीरां के कृष्ण के प्रति असीम प्रेम को दर्शाती है। वह चाहती हैं कि भगवान श्री कृष्ण उनके पलंग पर बैठें और वह अपने प्रेम में पूर्ण रूप से समाहित हो जाएं। "भमर" का अर्थ है मधुमक्खी, और यहां मीरां बाई ने इसे इस रूप में लिया है कि जैसे मधुमक्खी फूलों में सुख पाती है, वैसे ही वह अपने प्रभु के साथ सुखी रहना चाहती हैं।
9. 'मीराँ बाई के प्रभू गिरिधर निर्गुन
अंतिम पंक्ति में मीरां बाई अपने प्रभु श्री कृष्ण को 'गिरिधर' (गिरिराज, गोवर्धन) के रूप में सम्बोधित करती हैं, जो निर्गुण (निर्दोष और निराकार) होते हुए भी पूरी दुनिया में उनके लिए साकार हैं। मीरां बाई का यह गीत भगवान के प्रति उनका पूर्ण समर्पण और उनके दिव्य रूप का स्पष्ट चित्रण है।
मीरां बाई का यह भक्ति गीत "आओ रे सलोना मारा मीठडा मोहन" न केवल भगवान श्री कृष्ण के प्रति उनका अद्वितीय प्रेम दर्शाता है, बल्कि यह भक्ति की उस गहरी यात्रा को भी उजागर करता है, जहां भक्त अपने प्रभु से पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता है। मीरां बाई का जीवन और उनके गीत आज भी हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति आत्मसमर्पण, प्रेम और भगवान के प्रति अडिग विश्वास की अवस्था होती है।
हर भक्त के दिल में मीरां बाई का गीत गूंजता है, और उनकी भक्ति का संदेश आज भी हमें प्रेरित करता है। "आओ रे सलोना" के साथ मीरां बाई हमें यह बताती हैं कि जब भक्त का दिल प्रेम से भर जाता है, तो भगवान स्वयं उसे अपनी उपस्थिति से आशीर्वादित करते हैं।
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हनुमान चालीसा: एक अद्भुत स्तुति
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धर्म अर्थ काम मोक्ष श्रीगुरु के चरणकमलों की धूलि से मन दर्पण को पवित्र कर मैं धर्म अर्थादि फलों को देने वाले श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार । बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥
हे पवनपुत्र ! मैं बुद्धिहीन आपका स्मरण करता हूं। मुझे आप बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए तथा मेरे दुःखों व दोषों का नाश कीजिए ।
॥ चौपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुंलोक उजागर ॥
हे हनुमान! आपकी जय हो। आप ज्ञान गुण सागर हैं। हे कपीश्वर! तीनों लोकों मैं आपकी कीर्ति प्रकट है।
रामदूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥
हे पवनसुत, अंजनीनन्दन ! श्रीराम के दूत ! इस संसार में आपके समान कोई दूसरा बलवान नहीं है।
महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी ॥
हे बजरंगी ! आप महावीर और पराक्रमी हैं। आप दुर्बुद्धि को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के सहायक हैं।
कंचन बरन विराज सुवेसा । कानन कुण्डल कुंचित केसा ॥
आपका कंचन जैसा रंग है। आप सुन्दर वस्त्रों से तथा कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।
हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै । कांधे मूंज जनेऊ साजै ॥
आपके हाथों में बज्र और ध्वजा है तथा आपके कन्धे पर मूंज का जनेऊ आपकी शोभा को बढ़ा रहा है।
शंकर सुवन केसरी नन्दन । तेज प्रताप महा जगबन्दन ॥
हे शंकर के अवतार! हे केसरीनन्दन! आपके पराक्रम और महान यश की सारे संसार में वन्दना होती है ।
विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ आप अत्यन्त चतुर, विद्यावान और गुणवान हैं। भगवान श्रीराम के कार्य करने को आप सदा आतुर रहते हैं। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥
आप श्रीराम की महिमा सुनने में आनन्द रस लेते हैं। प्रभु राम, सीता व लक्ष्मण सहित आपके हृदय में बसते हैं ।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंक जरावा ॥
आपने अति छोटा रूप धारण कर माता सीता को दिखाया तथा भयंकर रूप धारण कर रावण की लंका जलाई ।
भीम रूप धरि असुर संहारे । रामचन्द्र जी के काज संवारे ॥
आपने भयंकर रूप धारण कर राक्षसों को मारा और भगवान श्रीराम के उद्देश्य को सफल बनाने में सहयोग दिया।
लाय संजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥
आपने संजीवनी लाकर लक्ष्मणजी को जीवनदान दिया, अतः श्रीराम ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया ।
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥
हे अंजनीनन्दन ! भगवान श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत जैसे प्यारे हो ।
सहस बदन तुम्हरो यश गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥
'हजारों मुख तुम्हारा यश गाएं' यह कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने आपको अपने हृदय से लगा लिया ।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥
सनत्, सनातन, सनक, सनन्दन आदि मुनि, ब्रह्मा आदि देवता एवं शेषनागजी सभी आपका गुणगान करते हैं ।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥
आपने सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी से मेल कराकर उन पर उपकार किया । उन्हें राजा बनवा दिया।
जम कुबेर दिक्पाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते ॥
यम, कुबेर, दिक्पाल, कवि और विद्वान - कोई भी आपके यश का पूरी तरह वर्णन नहीं कर सकते।
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥
आपके परामर्श को विभीषण ने माना, जिसके फलस्वरूप वे लंका के राजा बने, इसको सारा संसार जानता है।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥
हजारों योजन दूर, जहां पहुंचने में हजारों युग लगें, उस सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया ।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लांघि गए अचरज नाहीं ॥
भगवान राम द्वारा दी गई अंगूठी मुंह में रखकर आपने समुद्र को लांघा । पर यह आपके लिए कोई आश्चर्य नहीं ।
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥
संसार के जितने भी कठिन से कठिन काम हैं वे सब आपकी कृपा से सहज और सुलभ हो जाते हैं ।
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥
आप श्रीरामचन्द्रजी के महल के द्वार के रखवाले हैं। आपकी आज्ञा के बिना वहां कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ॥
आपकी शरण में आने वाले व्यक्ति को सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं और उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं रहता ।
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हांक ते कांपै ॥
अपने वेग को केवल आप ही सह सकते हैं। आपकी सिंह-गर्जना से तीनों लोकों के प्राणी कांप जाते हैं।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महावीर जब नाम सुनावै ॥
जो आपके 'महावीर' नाम का जप करता है, भूत-पिशाच जैसी दुष्ट आत्माएं उसके पास नहीं आ सकतीं।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥
हे वीर हनुमानजी! आपके नाम का निरन्तर जप करने से समस्त रोग और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
संकट ते हनुमान छुड़ावै । मन-क्रम-वचन ध्यान जो लावै ॥
जो मन क्रम-वचन से आपका ध्यान करता है, हे हनुमान आप उनको दुःखों-संकटों से छुड़ा लेते हैं ।
सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥
राजा श्रीरामचन्द्रजी विश्व में सर्वश्रेष्ठ और तपस्वी राजा हैं, उनके सभी कार्यों को आपने पूर्ण कर दिया।
और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥
जो कोई भी भक्त आपका सुमिरन करता है उसके सभी मनोरथ आपकी कृपा से तुरंत पूर्ण होते हैं।
चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
हे राम भक्त! आपका यश चारों युगों में विद्यमान है । सम्पूर्ण संसार में आपकी कीर्ति प्रकाशमान है ।
साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
हे श्रीराम के दुलारे हनुमानजी! आप साधु-सन्त, सज्जन और धर्म की रक्षा करते हैं, असुरों का सर्वनाश करते हैं।
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता ॥
माता श्रीजानकीजी के वर स्वरूप आप किसी भी भक्त को 'आठों सिद्धियां' और 'नौ निधियां' दे सकते हैं।
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥
आप सदैव श्रीरघुनाथजी की शरण में रहते हैं, इसलिए आपके पास असाध्य रोगों की औषधि राम-नाम है।
तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम-जनम के दुख बिसरावै ॥
आपका भजन करने वाले को श्रीराम के दर्शन होते हैं और उनके जन्म- जन्मांतर के दुःख दूर हो जाते हैं।
अन्तकाल रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ॥
आपको भजने वाले प्राणी अन्त में श्रीराम के धाम जाते हैं। और मृत्युलोक में जन्म लेकर हरिभक्त कहलाते हैं।
और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥
जो सच्चे मन से आपकी सेवा करता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं, वह किसी और देवता को फिर क्यों पूजे ?
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥
हे बलवीर हनुमानजी! जो मात्र आपका स्मरण करता है, उसके सब संकट और पीड़ाएं मिट जाती हैं।
जय जय जय हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥
हे वीर हनुमानजी! आपकी सदा जय हो, जय हो, जय हो । आप मुझ पर श्रीगुरुजी के समान कृपा कीजिए ।
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई ॥
जो प्रतिदिन इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा, वह समस्त बन्धनों से छूट कर परमसुखी हो जाएगा।
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
गौरीपति भगवान शिव साक्षी हैं कि जो इस हनुमान चालीसा को पढ़ेगा, उसे अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा ॥
हे मेरे नाथ हनुमानजी! 'तुलसीदास' सदा ही 'श्रीराम' का दास है, अतः आप उसके हृदय में सदा निवास कीजिए ।
पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप । रामलखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥
हे पवनपुत्र ! आप संकट हरण और मंगल रूप हैं । आप श्रीराम, जानकी एवं लक्ष्मण सहित सदा मेरे हृदय में निवास करें।
जीवन में लक्ष्य प्राप्ति के लिए अटल संकल्प की आवश्यकता
आज के यंत्र युग में हम सब तरह के सुख-साधनों से घिरे हुए हैं। फिर भी हमारे अंदर एक खालीपन सा रहता है और हम अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाते हैं। यह इसलिए है क्योंकि हम कई बार बिना किसी लक्ष्य के आगे बढ़ते हैं और बाद में भटक जाते हैं।
ध्येय प्राप्ति की राह पर अग्रसर होने के लिए हमें अपने विचारों को एकाग्र करना होगा। अगर हम अलग-अलग दिशाओं में बिखरे रहेंगे तो कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण बनाना बहुत जरूरी है।
हमारा दृष्टिकोण ही हमारे जीवन की दिशा तय करता है। यदि हमने जीवन की वास्तविकता को समझ लिया है, तो हमारा लक्ष्य अपनी चेतना को परिष्कृत करना होना चाहिए। इस तरह से हम न केवल अपने ध्येय को प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि आत्म-अनुशासन और संतुष्टि भी प्राप्त कर सकेंगे।
लक्ष्य प्राप्ति की यात्रा आसान नहीं है, लेकिन एक अटल प्रतिबद्धता के साथ हम निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। इसलिए आज ही अपने जीवन के मकसद को स्पष्ट करें और लगातार उस दिशा में आगे बढ़ते रहें। याद रखें, सिर्फ दृढ़ संकल्प ही आपको मंजिल तक पहुंचा सकता है।
हिंदी साहित्य की कालजयी और आधुनिक प्रसिद्ध रचनायें
हिंदी साहित्य में कई कालजयी और आधुनिक प्रसिद्ध रचनाएँ हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
कालजयी रचनाएँ:
- पृथ्वीराज रासो - चंद बरदाई
- पद्मावत - मलिक मुहम्मद जायसी
- सूरदास की रचनाएँ - सूरदास
- रामचरितमानस - तुलसीदास
- पद्मनाभ का काव्य - पद्मनाभ
- चित्रालेखा - भारतेंदु हरिश्चंद्र
आधुनिक रचनाएँ:
- गोदान - मुंशी प्रेमचंद
- राग दरबारी - श्रीलाल शुक्ल
- कर्मभूमि - महादेवी वर्मा
- कितने पाकिस्तान - राजेंद्र यादव
- तुलसी के फूल - जैनेंद्र कुमार
- तितली के दीप - यशपाल
- निराला के काव्य संग्रह
- हरिवंश राय बच्चन की रचनाएँ