प्रभात

रात्रि की चादर ढलती है धीरे-धीरे,  
अंधकार का साम्राज्य टूटता है निरंतर।  
क्षितिज पर सुनहरी अग्नि की रेखा,  
जैसे ईश्वर ने लिखी हो नई गाथा।  

ओ सूर्य! तेरे रथ के पहिए जब घूमते हैं,  
धरती के हृदय में जीवन की ध्वनि गूंजती है।  
तेरी किरणें—स्वर्णिम तीरों सी,  
नव आशा के कक्ष में प्रवेश करती हैं।  

निद्रा से जागते वृक्ष, पवन में झूमते,  
पक्षियों के स्वर गूँजते जैसे वीणा की तान।  
हर कण में नया उत्सव, हर श्वास में नया गीत,  
सूर्योदय—मानवता का शाश्वत पुनर्जन्म।  

हे प्रभात! तू केवल प्रकाश नहीं,  
तू आत्मा का पुनरुत्थान है।  
तेरे संग हर दिन एक नाटक आरंभ होता है,  
जहाँ जीवन स्वयं रंगमंच पर उतरता है।  

आने वाली सुबह

 



आने वाली सुबह  

शायद सिर्फ़ नई रोशनी नहीं होगी,  

शायद किसी पुरानी थकान का  

धीरे‑धीरे उतरता हुआ बोझ होगी।  


रात भर जागती जो चिंताएँ थीं,  

उनकी पलकों पर जब ओस जमेगी,  

तो पहली किरण  

धीरे से उनका माथा चूम कर पूछेगी—  

अब चलें?  


खिड़की की सलाख़ों से  

रेंगती हुई जो हल्की‑सी धूप आएगी,  

वो याद दिलाएगी कि  

बीता हुआ दिन फैसला नहीं,  

बस एक ड्राफ़्ट था  

जिसे आज फिर से सुधारा जा सकता है।  


आने वाली हर सुबह  

किनारे पर लौटती उस लहर जैसी है,  

जो हर बार नई कहानियाँ लेकर आती है,  

भले ही  

कल की रेत पर लिखी इबारतें  

समंदर ने मिटा दी हों।  


तो जब भी अगली सुबह  

तुम्हारे दरवाज़े पर हल्के‑हल्के दस्तक दे,  

ज़रा मुस्कुरा कर कहना—  

ठहर, मैं भी  

थोड़ा‑सा नया हो कर आता हूँ।


-KS

असल “प्रभात”

सुबह जब मुस्कुरा उठी तो लगा जैसे समय ने एक और मौका चुपके से हथेलियों पर रख दिया हो— बिना शोर, बिना ऐलान के। रात भर जो सवाल छत की दरारों में टंगे रहे, सुबह की पहली किरण ने उन्हें हल नहीं किया, बस इतना किया कि अँधेरे को थोड़ा कम कर दिया, ताकि हम अपने ही चेहरे को थोड़ा साफ़ देख सकें। हर नई सुबह किसी जवाब की नहीं, एक नए प्रश्न की जन्मस्थली है— मैं कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ, और जो भागदौड़ में खो गया कल, वो सच में ज़रूरी था भी या नहीं। सुबह जब मुस्कुरा उठी तो समझ आया कि दिन बदलने से ज़्यादा ज़रूरी नज़र का बदलना होता है। सूरज तो हर रोज़ लगभग एक ही समय पर उगता है, पर अर्थ तभी बदलता है जब हम अपने भीतर की खिड़की थोड़ी और खोल देते हैं। शायद ज़िंदगी भी इन सुबहों की तरह ही है— न पूरी रोशनी, न पूरा अँधेरा, बस दो के बीच का एक पुल, जहाँ चलते‑चलते हम सीखते हैं कि मंज़िल से ज़्यादा सवाल पूछने की हिम्मत ही असल “प्रभात” है। -KS

पिछली रात ....

पिछली रात की तरह आज भी

रेत ठंडी है, हवा नम है,

आकाश पर चाँद आधा है,

पर उसका दिल पूरा भरा हुआ है

उन अधूरे क़दमों की आहट से।

वो जानता है,

लहरों को जाना ही होगा,

पर फिर भी दिल के किसी कोने में

एक छोटा सा किनारा रोज़ बन जाता है,

जहाँ वो चुपचाप खड़ा

बस इतना सा ख्वाब देखता है—

कभी तो कोई लहर

लौटकर न जाए…।

हिन्दी साहित्य का आधुनिक इतिहास

हिन्दी साहित्य का आधुनिक इतिहास

हिन्दी साहित्य का आधुनिक इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से आरम्भ होकर वर्तमान समय तक फैला एक सजीव और गतिशील कालक्रम है। यह वह युग है जिसने भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन, राष्ट्रीय चेतना, आधुनिकता, विज्ञान, तथा मनोवैज्ञानिक दृष्टियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की। इस काल में हिन्दी साहित्य ने न सिर्फ रूप बदला, बल्कि भाषा, शैली, विषय, संवेदना और सौन्दर्यबोध में भी व्यापक परिवर्तन देखे।


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आधुनिक युग की शुरुआत

आधुनिक हिन्दी साहित्य का आरम्भ सामान्यतः भारतेंदु हरिश्चन्द्र (1850–1885) से माना जाता है। अंग्रेज़ी शासन की स्थापना, पश्चिमी शिक्षा का प्रसार, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन ने भारतीय समाज को नया दृष्टिकोण दिया। इन परिवर्तनों का प्रभाव हिन्दी साहित्य पर गहरा पड़ा और एक नई साहित्यिक चेतना जन्मी।
इस युग ने भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने, समाज-सुधार प्रसंगों को प्रमुखता देने और नए साहित्यिक रूपों को विकसित करने का कार्य किया।


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हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग के मुख्य चरण

आधुनिक हिन्दी साहित्य को सामान्यतः पाँच प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है:

1. भारतेंदु युग (लगभग 1868–1900 ई.)

यह युग आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रथम चरण है, जिसका केंद्र है—
राष्ट्रजागरण, नवचेतना, सामाजिक सुधार और आधुनिकता।

प्रमुख विशेषताएँ

देश-भक्ति, सामाजिक चेतना, स्वदेशी विचार

पश्चिमी शिक्षा और विज्ञान से प्रभावित नवीन दृष्टि

नाटक, पत्रकारिता और निबंध लेखन का उत्कर्ष

भाषा के रूप में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा


प्रमुख रचनाकार

भारतेंदु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह आदि।


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2. द्विवेदी युग (1900–1918 ई.)

महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में "सरस्वती" पत्रिका द्वारा यह काल हिन्दी में शुद्धता, सरलता और तर्कपूर्ण गद्य का युग बना।

प्रमुख विशेषताएँ

भाषा-शुद्धि एवं व्याकरणिक सुदृढ़ता

नैतिक, राष्ट्रीय तथा सामाजिक चेतना

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

खड़ी बोली को साहित्य की प्रमुख भाषा बनाना


प्रमुख लेखक

द्विवेदीजी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, नलिन विलोचन शर्मा, रामनरेश त्रिपाठी आदि।


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3. छायावाद युग (1918–1936 ई.)

यह हिन्दी का रोमांटिक और भावनात्मक उत्कर्ष काल है, जिसमें कविता में आत्मानुभूति, प्रकृति-सौन्दर्य और कल्पना का आधिपत्य देखा गया।

प्रमुख विशेषताएँ

प्रकृति-चित्रण एवं सौन्दर्यबोध

आत्मविश्लेषण एवं रहस्यवाद

भावुकता, कल्पनाशीलता और संगीतमय भाषा

प्रतीक, रूपक और अलंकारों का प्रयोग


चार स्तंभ—

जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा।


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4. प्रगतिवाद (1936–1945 ई.)

छायावाद की भावुकता के विरुद्ध यह युग यथार्थवाद, वर्ग-संघर्ष और सामाजिक अन्याय के खिलाफ साहित्यिक आंदोलन बना।

प्रमुख विशेषताएँ

शोषित वर्ग के जीवन का यथार्थ चित्रण

सामाजिक-राजनीतिक अन्याय के प्रति संघर्ष

जनवादी चेतना

साहित्य को जीवन की वास्तविकता से जोड़ना


प्रमुख लेखक

रामविलास शर्मा, नागार्जुन, राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय के प्रारंभिक लेखन, नाग्फनी समूह आदि।


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5. प्रयोगवाद और नयी कविता (1945–1970 और आगे)

प्रयोगवाद

अज्ञेय के नेतृत्व में यह आंदोलन कविता को नए बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और संरचनात्मक प्रयोगों की ओर ले गया।

नयी भाषा, नये बिम्ब

आधुनिक मनुष्य की जटिलता

दार्शनिक गहराई


नयी कविता

1950 के बाद कविता में शहरी मानवीय जीवन, अस्तित्वबोध, अकेलापन और आधुनिक समस्याओं का चित्रण प्रमुख हुआ।

गहन व्यक्तिवाद

अस्मिता और बेचैनी

सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाएँ


प्रमुख कवि: अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, भवानीप्रसाद मिश्र, धर्मवीर भारती, गजानन माधव मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय।


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आधुनिक युग की अन्य प्रवृत्तियाँ

1. नई कहानी आंदोलन

राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश, कमलेश्वर द्वारा—

मनोवैज्ञानिक यथार्थ

मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबनाएँ


2. नई कविता और अकविता

मुक्तिबोध, शमशेर, धूमिल आदि द्वारा तीखा सामाजिक-राजनीतिक स्वर।


3. आधुनिक उपन्यास

प्रेमचंद के यथार्थवाद से लेकर यशपाल, जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी तक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपन्यासों का विकास।


4. समकालीन साहित्य

1970 के बाद—

स्त्री-लेखन

दलित साहित्य

आदिवासी साहित्य

उत्तर-आधुनिक लेखन

भाषाई प्रयोग और डिजिटल साहित्य

निष्कर्ष

हिन्दी साहित्य का आधुनिक इतिहास विविधता, परिवर्तन और नवोन्मेष का इतिहास है। भारतेंदु युग की राष्ट्र-चेतना से लेकर नयी कविता की मनोवैज्ञानिक गहराई, और आज के डिजिटल युग के समावेशी साहित्य तक हिन्दी ने निरंतर अपनी संवेदना और अभिव्यक्ति को विस्तृत किया है। यह काल न केवल साहित्यिक रूपों और शैलियों के विकास का परिचायक है, बल्कि भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन का सजीव दर्पण भी है।

Ek Boond | एक बूँद: परिवर्तन और संभावना की अमर कविता

परिचय

हिन्दी साहित्य में ‘एक बूँद’ (कवि: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’) जीवन, बदलाव और आत्म-अस्तित्व की गहन प्रेरणा देनेवाली कविता है। यह कविता न केवल सुंदर शब्दचित्रों से भरी है, बल्कि हमें साहस और आत्मविश्वास के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देती है।

पूरा कविता-पाठ

देव!! मेरे भाग्य में क्या है बदा,

मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में?

या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,

चू पडूँगी या कमल के फूल में?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा

वह समुद्र ओर आई अनमनी

एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला

वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते

जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर

किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें

बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।

भावार्थ व विश्लेषण

कविता की शुरुआत बूँद के असमंजस, चिंतन और भय से होती है। “बूँद” बादल से स्वयं को अलग करती है, लेकिन आगे के सफ़र का डर उसे सोच में डाल देता है। जीवन में अक्सर, जब हमें अपनी ‘सुरक्षित जगह’ छोड़नी पड़ती है, तो असमंजस और अनिश्चितता का भाव आता है।

दूसरे पद में बूँद अपने भाग्य पर विचार करती है—क्या होगा उसका? बर्बाद होगी, मिट्टी हो जाएगी, या किसी सुन्दर कमल पर संवर जाएगी? यही जीवन की दुविधा है: आगे बढ़ने का जोखिम, लेकिन उसमें छिपी संभावनाएँ भी।

तीसरे पद में वह हवा में बहकर समुद्र तक पहुँचती है और एक खुली सीप में गिर जाती है। वहीं उसकी पहचान बदल जाती है, वह बूँद अब अमूल्य मोती बन जाती है।

आखरी पद में कवि स्पष्ट संदेश देते हैं—अक्सर जब बदलाव का समय आता है, तो लोग झिझकते हैं, घर-सुरक्षा छोड़ने का डर होता है। पर त्याग और साहस आखिर उन्हें नई पहचान और मूल्य प्रदान करते हैं—जैसे बूँद मोती बन जाती है।

जीवन-प्रेरणा

“एक बूँद” सिर्फ कविता नहीं, जीवन का मार्गदर्शन है। यह चुनौती, डर और परिवर्तन के क्षणों में हमें आगे बढ़ने, और अपनी पहचान पाने की प्रेरणा देती है। बदलाव, अनिश्चितता और नए अवसरों का सामना, चाहे कितना भी कठिन लगे, अंततः आपके भीतर छिपी ताकत और असली अस्तित्व को सामने लाता है।

निष्कर्ष

हरिऔध की “एक बूँद” जीवन के साहसिक निर्णयों, त्याग, परिवर्तन और संभावना का प्रतीक है। यदि आपने कभी अपने संकोच या डर को पार किया है, तो आप उस बूँद के अद्भुत सफर को ज़रूर महसूस करेंगे। जीवन में अग्रसर हों—बूँद की तरह, मोती बनने की ओर!

पाठकों से सवाल:
क्या आपने कभी ऐसी स्थिति महसूस की, जब डर को पीछे छोड़कर नया कदम उठाया और उसके बाद मिली नई पहचान या उपलब्धि? कमेंट ज़रूर करें!


जित देखो उत रामहिँ रामा: एक आध्यात्मिक विश्वदर्शन

 जित देखो उत रामहिँ रामा

जित देखो उत पूरण कामा


तृण तरुवर साते सागर

जिते देखो उत मोहन नागर


जल थल काष्ठ पषाण अकाशा

चंद्र सुरज नच तेज प्रकाशा


मोरे मन मानस राम भजो रे

'रामदास' प्रभु ऐसा करो रे