नया दिन, नई दौड़

रात की चादर हटे,  
आभा स्वर्णिम फूटे।  
क्षितिज पर अग्नि जगे,  
जीवन फिर से छूटे।  

पक्षी गाएँ मधुर गान,  
पवन करे आलिंगन।  
सूर्य किरणें दें संदेश—  
हर प्रभात है पुनर्जन्म।  

प्रभात का आगमन मानो जीवन की किताब का नया अध्याय हो। रात की काली चादर जब हटती है, तो लगता है जैसे अंधकार ने बोरिया-बिस्तर बाँध लिया हो और उजाले ने घर-आँगन में डेरा डाल दिया हो। सूर्योदय की पहली किरण, सोने पर सुहागा की तरह, थके हुए मन में नई ऊर्जा भर देती है।

सूर्य का उदय केवल प्रकाश नहीं, बल्कि आत्मा का पुनर्जन्म है। यह उस दीपक की लौ है जो बुझते-बुझते फिर से जल उठती है। पक्षियों का कलरव कानों में रस घोलता है, जैसे वीणा की झंकार। पवन का स्पर्श मन को ठंडी छाया देता है—मानो जीवन की प्यास बुझाने वाला अमृत।

“नया दिन, नई दौड़” और सच ही है—हर प्रभात हमें फिर से कर्मभूमि पर उतरने का अवसर देता है। यह वह क्षण है जब “सोई किस्मत जाग उठती है”, जब “मन के अंधेरे में दीया जलता है”

देखें तो सूर्योदय है—जैसे नवजात शिशु की मुस्कान, वैसे ही क्षितिज पर फैलती लालिमा। हर प्रभात पुनर्जन्म है, जहाँ हर दिन जीवन का नया नाटक आरंभ होता है।

इसलिए कहा गया है—हर प्रभात है पुनर्जन्म। यह केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मा का पुनः जागरण है, जो हमें याद दिलाता है कि जीवन हर दिन नया है, और हर दिन हमें फिर से जीने का अवसर देता है।


दहलीज़

 दहलीज़, एक घर की मिट्टी पर उभरी पतली-सी रेखा नहीं भर,

यहीं से आँगन और संसार,

अपनापन और अजनबीयत

पहली बार एक-दूसरे को पहचानते हैं।



कभी यह वर्जना है—

“यहाँ तक आना, आगे मत बढ़ना”,

तो कभी यह आमंत्रण—

“बस एक क़दम और, फिर नया जीवन शुरू।”



कभी मन की दहलीज़ पर ठिठक जाती हैं बातें,

होंठों तक आकर भी शब्द नहीं बनतीं,

जैसे सत्य दरवाज़े की चौखट पर खड़ा

हमारे साहस का इंतज़ार करता रहे।



और कभी ज्ञान की दहलीज़ होती है—

एक ऐसा पल, जिसके बाद

पुरानी समझ लौट कर नहीं आती,

जहाँ से आगे जो दिखता है,

वह वही दुनिया होती है,

पर देखने वाली नज़र

हमेशा के लिए बदल चुकी होती है।

स्वप्न और जागरण II

स्वप्न और जागरण के बीच जो पल ठहर जाता है, वहीं असली मैं का पहला परिचय मिलता है; आँखें खुली हों या मूँदी, बात बस इतनी-सी है— जो भीतर जाग रहा हो, जीवन असल में वही होता है।

स्वप्न और जागरण

तेरी पलकों में ठहरी नींद ने बस इतना-सा भेद बताया है— समय न बाहर रुकता है, न घड़ी की सुइयों में, वह तो वहीं ठहर जाता है एक क्षण को, जहाँ मन यह पहचान ले कि जो घट रहा है, वही स्वप्न, और जो देख रहा है, वही सच्चा जागना है।

उपमा से भी परे तू

तेरी पलकों पर ठहरी हुई नींद भी कुछ कहती होगी, ज्यों मानसरोवर पर झुकी चाँदनी चुपचाप लहरों से बात करे। समय – ये चोरन का सरदार – चुरा लेता मुस्कान तेरे अरुण अधरों से, फिर भी तेरे नयन दीपक-से हर अँधियारे को दीवाली बना दें। अम्बर आज मानो तेरे आँगन का झूला-सा झूल रहा हो, तारे तेरे नूपुर बन धीमे-धीमे रुनझुन गुनगुनाते हैं। हे प्रिये, तू ऐसी उपमा है, जिसकी तुलना में उपमान भी लज्जाते, जैसे भारत के सम भारत, वैसे ही तेरे सम तुझी को पाते।

प्रभात

रात्रि की चादर ढलती है धीरे-धीरे,  
अंधकार का साम्राज्य टूटता है निरंतर।  
क्षितिज पर सुनहरी अग्नि की रेखा,  
जैसे ईश्वर ने लिखी हो नई गाथा।  

ओ सूर्य! तेरे रथ के पहिए जब घूमते हैं,  
धरती के हृदय में जीवन की ध्वनि गूंजती है।  
तेरी किरणें—स्वर्णिम तीरों सी,  
नव आशा के कक्ष में प्रवेश करती हैं।  

निद्रा से जागते वृक्ष, पवन में झूमते,  
पक्षियों के स्वर गूँजते जैसे वीणा की तान।  
हर कण में नया उत्सव, हर श्वास में नया गीत,  
सूर्योदय—मानवता का शाश्वत पुनर्जन्म।  

हे प्रभात! तू केवल प्रकाश नहीं,  
तू आत्मा का पुनरुत्थान है।  
तेरे संग हर दिन एक नाटक आरंभ होता है,  
जहाँ जीवन स्वयं रंगमंच पर उतरता है।